बिखरे मोती

     कितने वर्ष हुए जब ब्याह कर आयी थी उनके संसार में। सब कुछ अपना पिछे छोड़ आयी थी। सिर्फ यादें लेकर आयी थी। दुनिया का दस्तूर है उससे कोन बच पाया है। सभी को निभाना पड़ता है। सो मायका छोड़ ससुराल को ही अपना घर बना था। कुछ समने सजा लायी थी मोतीयों की तरह। बस प्रेम के धागे से पोकर उन्हे माला बनाना था। एक नयी जिन्दगी की शरूआत , चाहतों का खिला आसमान मिला था। ख्वाहिश थी एक अपने अशियाने की । मै यही चाहती थी कि उनका साथ कायम रहे उम्र भर के लिये, हंसते रोते मगर रहती सॉसों तक न छूटने वाला साथ। जैसा चाहा सब कुछ वैसा ही था। अरमानों के पंखों पर सवार जिन्दगी की शुरूआत हुई । दो जहॉ की दौलत सी पा गयी थी। समय पंख लगाकर उड़ चला था। उपर वाला हर सुख बिन मांगे ही दे रहा था। पहले साल में ही गोद भी हरी हो गयी। घर नन्ही किलकारियों से गूंज उठा। नवयोवना से मॉ बनने का सफर हर पल महसूस किया। बेटी जब गोद में आयी औरत होने के नाते आज सम्पूर्ण हुई। दो साल बाद बेटा भी आ गया। अब अपनी ख्वाहिश थी अपने सपनों के घर को पूरा करने की। इन्होने भी खूब मेहनत की , मेहनत रंग लायी और हमारा अपना अशियाना तैयार हो गया। सपनों के रंग से रंगीन सारी दुनिया की खुशियों का बसेरा था वहॉ। 
समय और गुजरा बच्चे भी स्कूल जाने लगे थे। अब जिन्दगी काफी मशरूफ हो गयी। बच्चों के मुश्तकबिल को लेकर । लेकिन इस मशरूफियत में धीरे धीरे खुद से लापरवाह सी हो चली थी। बच्चों की देखभाल और घर की साज सम्भाल , खुद के लिये वक्त हीं नही मिल पाता था। कभी कभी यह शिकायत भी किया करते थे, यही वक्त हमारा भी है लौटकर नहीं आयेगा। मै समझती भी थी , कहीं कही साथ दे पाती थी कही छूट जाता था। 
मेरा सपना था मेरे परिवार को आदर्श परिवार बनाउंगी, जहॉ सुख और दुख का समान बॅटवारा होगा। जरूरतों के साथ अहसास और जज्बात भी बंटेगे। बच्चे जब बड़े हुए उनकी अपनी सोच भी बड़ी होने लगी। मै जैसे समझाती वो नहीं समझ पाते या फिर समझना ही नहीं चाहते। नयी पीढ़ी और हममे काफी सोच का फासला बढ़ जाता है। आज की पीढ़ी जज्बातों को उतना जरूरी नहीं समझती, सिर्फ खुद को उॅचा साबित करने में दूसरों को कमतर ही समझती है। बच्चों पर समझाइस का असर न होते देख कही भीतर तक दुखी हो जाती। परिवार मंे साथ रहना ही जरूरी नहीं होता, परिवार परवाह से मजबूत बनता है। बच्चे अपनी जिन्दगी अपनी शर्तो पर जीना पसंद करते है, नहीं समझ पा रही थी। इस बात को लेकर काफी तनाव सा महसूस करने लगी थी। ऐसे वक्त में इन्होने मुझे समझाया कि इस उम्र ऐसा ही होता है। तुम्हे थोड़ा वक्त देना चाहिये, मैने सोचा ठीक है थोड़ा इंतेजार करके देखना चाहिये। यह जरूरी नहीं कि जैसा हम चाहते है वैसा ही हो। 
मुझे लगा किसी को एहसास नहीं है सो मेरी समझाईस का कोई मतलब नहीं । मैने अपना ध्यान दूसरी ओर लगाने का सोचा। मैने अपने दिमाग से विचारों की धूल साफ की ।मैने देखा चमक अभी बरकारार थी, ज्यादा साचने से चीजें बिगड़ जाती है। लगा मै खुद को रखकर कही भूल गयी थी। मैने सोचा खुद को ढूढना चाहिये। मै उठी खुद को आइने में देखा जिस्म पर से कितने बरस गुजर गये थे। उम्र अपने निशान छोड़ गयी थी। इस वक्त यह उम्र का ठीक बीच का पढ़ाव था जहॉ से बीत चुके और आने वर्षो को देख सकती थी। उम्र के इस मोढ़ पर न जाने क्यों उदासी घेर ही लेती है। सबकी पसंद न पसंद पूरी करने में खुद को भुला बैठी थी , अब कुछ वक्त अपने लिये भी चुराया जाये। कोई दबी छुपी इच्छा को पूरा करके ही संतुष्टी का अनुभव करना होगा। जब कभी हमारी सफलता बाधित सी होने लगती है तो महौल और स्वभाव में कसेलापन आ जाता है। यह बात जरूरी है कि पहले सबके साथ खुद को भी महसूस किया जाये। मै भी अब समेट लेना चाहती थी उन लम्हों को जो कही बहुत बहत्तर करने की कोशिश में खिर गये थे। दिल खुश तो दुनिया खूबसूरत। सब चिन्ताऐं छोड़ अब जिन्दगी में उन लम्हों का सम्भालना चाहती थी जिन पर मै खुद अपनी मुस्कुराहट लिख सकूॅ। लगा जो बिखर गये थे सपने और खुशी के मोती अब उन्हे माला में बांधकर ही रहूॅगी। कुछ वक्त खुद के लिये खुद को खुद ही से मिलाने का वक्त आ गया था। बिखरे मोती समेट उन्हे माला में पिराने लग गयी।                   
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अफसाना ‘अन्जुम’    

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