मेरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता

मेरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता ?
मग़र मैं क्या करूँ, ख़ामोशियाँ तुमने नवाज़ी हैं 
कि जब मैं बोलता था प्रेम में डूबा हुआ पहले 
तुम्हारे पास रहकर भी तुम्हारे ख़्वाब में खोया 
न जाने क्या करूँ ऐसा कि तुम खुलकर हँसो जाँना 
तुम्हारी इक हंसी के वास्ते, सौ-बात बुनता था 
तुम्ही तो डाँटती थी ना मुझे कहते हुए ये कि 
ज़रा चुप भी रहो, कितना ज़ियादा बोलते हो तुम..
खबर तुमको नहीं होगी कि यूँ ख़ामोश होने में 
गला काटा है मैंने अपने ज़ज़्बातों-ओ-ख़्वाबों का 
दरेरे हैं ज़ख़म मैंने मिरे माज़ी से लेकर के 
बड़ी लाशें दफ़न कर के हुआ हूँ कब्रगाहों-सा 
तुम्हें मालूम है उनको दफ़न के वास्ते मैंने 
घसीटा है पकड़कर के ज़मीने-खार पे जाँना 
बड़े तेज़ाब डाले हैं जिसम-ए-चाक पे उनके 
कई बोटी में बाँटा और कुचला है उन्हें जाँना 
मुझे शक़ था कहीं थोड़ी बहुत भी जाँ रहेगी तो 
अगर ये फिर उठेंगे तो मुझे फिर से कहोगी तुम 
ज़रा चुप भी रहो, कितना ज़ियादा बोलते हो तुम
अभी ख़ामोश हूँ मैं और अब खामोशियों में गुम
मुझे ख़ामोशियाँ अच्छी सहेली सी लगी हैं अब 
सहर से शाम होती है गुज़र जाती है रातें भी 
मग़र ख़ामोश रहता हूँ किसी से कुछ नहीं कहता 
समझता हूँ बहुत अच्छा है ये ख़ामोश हो जाना 
सुनो ! जैसा कहा तुमने किया मैंने तो वैसा ही...
मिरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता ?

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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