ग़ज़ल- आप बेहतर हैं और कमतर हम

आप बेहतर हैं और कमतर हम
आप अव्वल हैं और दीगर हम।

आपके बोल, इस तरह के हैं
काँपते हैं ज़नाब ! थर-थर हम।

आप साबूत हैं, न होकर भी
और होकर के भी हैं जर्जर हम।

आप तो थामने को आये थे ? 
आप के साथ गये मर-मर हम।

इस हुनर पे तो दाद बनती है
आप क़ातिल हैं और अंदर हम।

आपमें-हममें, फर्क है बेशक
आप छुपते हैं और खुलकर हम।

आप तरसेंगे मुंसिफ़ी के लिये 
ग़र न आएँगे,दिने-महशर हम।

एक मिलती-सी बात है हममें 
हैं, मकानों के बीच,बे-घर हम।

मिरे बच्चे ! तिरी ख़ता ये है
कि वो नीचे थीं और ऊपर हम।

फ़ासला भी रखें तो अच्छे से
लौट आये थे,यही कहकर हम।

दौर का तौर अब नया है 'दीप'
तो नहीं लगते गले कसकर हम।

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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