दूरियां

कितना सुखदायक है
ये हर्ष और हमारी वार्ताएं
जो मिटा देती हैं दूरियां
और
निकल जाता है समय
निरन्तर दूर कहीं,
हमारे मध्य व्याप्त
उनमीलों की
मत करो गणना
वो दूरी
हमारे लिए अब शुन्य है,
मात्र
स्मरण करो उन क्षणों को
जो जीए हैं हमने
और भरी है जिन्होंने
निकटता हमारे भीतर,
इन्हीं स्मृतियों से
स्वतः ही
मिट जाएगी दूरियां
वो मिटा देगी
उनमीलों को
जो
व्याप्त है हमारे मध्य।

रौशन जसवाल ‘विक्षिप्त’
सम्पर्क, शान्त कंवल कुंज, ढली शिमला

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