मृत्यु


चंद साँसों का उकताकर
साथ छोड़ देना भर नहीं
और न ही है ये 
किसी अजर, अमर आत्मा का 
तफ़रीह के लिए
अनायास चले जाना 
यह उतनी सरल नहीं 
प्राय: जो दृष्टिमान है

प्रारंभ से अंत तक  
समाप्ति के ठीक अंतिम चरण तक
जीना होता है सम्पूर्ण जीवन
हाँ, एक जरा-सा दिल टूटने पर
सहज ही आ जाता होगा तुम्हें  
आत्महत्या का विचार
न संगी-साथी कोई 
न सांत्वना देने वाला 
स्वयं को इस दुनिया में
व्यर्थ,असमर्थ, नितांत अकेला पाते होगे तुम
क्योंकि तुमने देखे ही कहाँ अभी 
असल दुःख

कभी किसी असहाय को 
घिसटकर चलते देखा है?
तलाशा है मुंदी आँखों से
टटोलते हुए 
कोई सुरक्षित कोना?
जाना है किसी पीड़िता की आँखें
हर वक़्त क्यूँ भरी रहतीं हैं? 
आधे शरीर के गुज़र जाने पर भी 
जीने की ललक से गुजरे हो?
जानते हो, बूढ़ी आँखों की प्रतीक्षा 
साँसों को क्यूँ नहीं कटने देतीं?
चौराहे पर बिलखते मासूम बचपन से 
जीने की वज़ह
या सर पर ईंटें ढोते
पसीने से लथपथ चेहरों को 
झिंझोड़कर पूछा कभी?
कि ये किससे शिकायत करते हैं?
कहाँ माथा पटकते हैं?
किस पर दोष मढ़ते हैं?
आख़िर ये सब हारकर क्यों नहीं मरते हैं???

प्रीति 'अज्ञात'
संस्थापक एवं संपादक - 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, सामाजिक कार्यकर्ता

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