भयभीत पंछी

मैं भयभीत पंछी गगन का 
आस कर रहा जिसे चूमने की, 
तन मन से संलग्न होकर 
तय करनी है दूरी अनन्त की।।

मैं भयभीत...............................
डर है मुझे काटे न कोई पंख मेरे
पिंजरे में सजा कर मैं शोभा बन रहा जगत की, 
उम्मीद विश्वास का आवरण बन घेरा है
फिर भी मन से एक आस का सवेरा है।।

मैं भयभीत................................
क्या अरमा? और औरस का अभाव
प्रकृति की सुन्दरता से खौफ मन का घाव,
तिलमिलाती ये दुनिया पसंद नहीं 
स्वत्रंत नहीं है विचारों से भी खुद का स्वभाव।। 

मैं भयभीत..............................
चोटिल हृदय से अवसर्ग का सवेरा 
चुनौतियों से भरा हर पथ है मेरा, 
विश्वास, विफलता और अनन्त का घेरा 
काले मेघों ने भी खोला जीवन का फेरा।।

मैं भयभीत..............................
चला मैं अनन्त की छांव में 
प्रकृति ने लिया मुझे खुद की बाँहों में, 
आँसू बहा कर सारा गगन रोया
आज मैंने पाया अपना स्वर्ण खोया।।

मैं भयभीत पंछी..............................
हरे हरे पंखो से हरियाली आयी
सुर से सुर मेघ संग प्रकृति गायी,
मना उत्सव मेरी स्वतंत्रता का अनन्त में 
आज मानो पूरी वसुन्धरा में खुशहाली आयी।।

मैं भयभीत पंछी.............................
मैं भयभीत पंछी गगन का 
अब स्वतंत्र विचरण कर रहा,
वसुन्धरा के आँचल में स्वप्न बुन रहा
अब दिल में कुछ करने का सहास है जगा।।
मैं भयभीत पंछी..............................

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पवनचन्द्र उप्रेती
सस्कृत विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय 

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