हिंदी बाल कविता में बाल मनोविज्ञान की समझ

        हिंदी बाल कविता आधुनिक युग की देन है और वह आधुनिक सर्जक के चिंतन की उपज है। ‘बाल कविता’ यानी बच्चों के लिए लिखी गयी कविता, जिसमें बच्चों की शिक्षा, जिज्ञासा, संस्कार एवं मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रचना की गई हो। वह चाहे माँ की लोरियों के रूप में हो, या पिता की नसीहतों के रूप में, या बच्चों के आपस के खेल-खेल में हो। इसमें भले ही निरर्थक शब्दों की ध्वनियाँ होती हैं, पर बड़ी आकर्षक होती हैं। जैसे-‘अक्कड़ बक्कड़ बंबे भो, ‘टापुर टापुर, ‘ओक्का-बोक्का तीन तिलोका, ‘लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा’ आदि इसी तरह की ध्वनियाँ हैं, जिसे सुनकर बालमन खिल उठता है।

        बच्चा जीवन की अनमोल निधि होता है। बच्चे स्वभाव से सहज, सरल, सरस, जिज्ञासु, उत्साह से भरा, कल्पना की पंख लगाकर पूरी दुनिया की सैर करने वाला तथा मौलिक रचनात्मकता से भरा होता है। बच्चों का मन हमेशा एक खोजी अन्वेषक की तरह है, जो हर समय क्रियाशील एवं सचेत रहता है। इसलिए हिंदी बाल कविता की पहली कोशिश यही रहनी चाहिए कि कोमल मन मस्तिष्क वाले बच्चों को प्यार भरी लुभावनी दुनिया में ले जाएं। जहाँ ऊँच-नीच का तथा छोटे-बड़े का कोई भेदभाव न हो, सिर्फ एक ऐसी दुनिया हो जिसमें प्रेम, सहयोग, सेवा तथा सौहार्द जैसा शांतिदायिनी वातावरण हो। पर बाजारवाद ने अपनी फैलाव इतना बढ़ा दिया है कि यह सपनों से भरा बचपन कहीं खोता जा रहा है, लेकिन अभी भी कुछ कविताएँ बचपन की याद दिलाती हैं, जिसका अत्यंत मर्मस्पर्शी एवं भावप्रवणता से भरा चित्र शंभुनाथ तिवारी की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है -

“माँ की चोटी खींच खींचकर,
दिन भर उसे सताता कौन।
दादी का चश्मा, दादा की,
छतरी-छड़ी छुपाता कौन।
दोनों की लाठी बनने को,
कोई भी तैयार न होता।
गर धरती पर इतना प्यारा,
बच्चों का संसार न होता।”1

        कविता किसी भी बाल साहित्य का महत्त्वपूर्ण भाग होती है। बाल साहित्य में कहानियाँ तथा लेख भी होते हैं, पर जो चीज बच्चों के जुबान पर याद रह जाती है, वह कविता है। बचपन में याद की हुई कविता बालक को व्यस्क होने के बाद भी आस्वादन करती रहती है। जैसे -

“बुंदेले हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।”2

        आज का समाज अतिव्यस्तता से भरा हुआ है। किसी के पास अपने बच्चों तक के लिए समय नहीं है। उनकी मीठी-मीठी तोतली बोली का आनंद लेने की फुरसत किसी के पास नहीं है। नौकरीपेशा माता-पिता के बच्चे अकेलेपन के संत्रास से जुझते रहते हैं। एक छोटी सी बच्ची की मासूम चाह कितनी छोटी, पर तनिक गंभीरता से सोचने पर कितनी मर्मस्पर्शी है, उषा यादव की यह कविता -
“बहुत बुरा लगता है मम्मी,
मुझे तुम्हारा ऑफिस जाना।
घर पर लौटू और उस समय,
दरवाजे पर ताला पाना।
जाने कितनी बातें उस पल,
चाहा करती तुमसे कहना,
माँ, तुम कल घर पर ही रहना।”3

बाल साहित्य की रचना बच्चों की मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार लिखा जाना चाहिए, जिससे बच्चों के मानसिक प्रशिक्षण के साथ उनके ज्ञान में भी निखार आए। बच्चों की दुनिया हमारी दुनिया से सर्वथा भिन्न होता है। उनके देखने, समझने तथा परखने का नजरिया हमारे नजरिये से भिन्न होता है। इसलिए बच्चों का साहित्य लिखने के लिए बच्चा बनना पड़ता है ताकि उनके स्तर पर उतरकर उनकी भावनाओं, रूचियों तथा उनके मनोविज्ञान के साथ तारतम्य बिठा सके। लल्ली प्रसाद पांडेय के अनुसार-

बाल साहित्य वही लिख सकता है, जो अपने को बच्चों जैसा बना ले। बड़े होकर बच्चा बनना मुश्किल है और उससे भी मुश्किल है बच्चा बनकर उसके अनुकूल लिखना।”4
        
बच्चे तरल पदार्थ की तरह है, जिसका अपना कोई स्वरूप नहीं होता, उसे जिस रूप में तथा जिस आकार में तैयार कर दे, वह वैसा ही स्वरूप धारण कर लेता है। इसी तरह बच्चे की आदत, स्वभाव, विचार तथा स्वरूप नहीं होता, उसे परिवार, समाज, परिवेश और संस्कार जिस साँचे में ढाल दे, वैसा ही बच्चों के व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारण हो जाता है। इसलिए बच्चों के कोमल मन में बचपन से ही प्यार, सच्चाई तथा ईमानदारी के साथ अपने देश की धरती के प्रति आत्मीयता की रस से आप्लावित करनी चाहिए। द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी की कविता में यह देखा जा सकता है -

“एक हमारी धरती सबकी/ जिसकी मिट्टी में जनमे हम,
मिली एक ही धूप हमें है/ सींचे गए एक जल से हम,
पले हुए हैं झूल-झूलकर/ पलनों में हम एक पवन के
हम सब सुमन एक उपवन के।”5

जिसे हमें ‘बचपनकहते हैं, उसमें उम्र की तीन अवस्थाओं का समावेश होता है। शिशु, बालक तथा किशोर। बचपन की इन्हीं अवस्थाओं के अनुरूप उनकी आयु तथा मानसिक क्षमता के आधार पर उनके लिए कविताओं का सृजन किया जाना चाहिए। साथ ही इसका ख्याल भी रखना चाहिए कि अलग-अलग परिस्थितियों तथा परिवेश में पले बढ़े एक ही आयु वर्ग के बच्चों की मानसिक विकास में भिन्नता पाई जाती है। तीन वर्ष से पांच वर्ष तक के बच्चे शिशुवस्था में आते हैं। इस उम्र तक बच्चे चीजों को समझने, पहचानने तथा उच्चरित करने लगते हैं। इनके लिए लिखी गई कविता ‘शिशुगीत’ कहलाता है, जिसे बच्चे सरलता से कंठस्थ कर लेते हैं जैसे-

“मछली जल की रानी है,
जीवन इसका पानी है।
हाथ लगाओगे तो डर जाएगी,
बाहर निकालोगे तो मर जाएगी।”6

        इसी तरह शिशु के छुट्टी के दिन का कितनी बेशब्री से इंतजार करते हैं इस बालमन को इस कविता में देखा जा सकता है -

“छुट्टी का दिन आया है,
सबके मन को भाया है।
आज न पढ़ने जाएंगे,
दिन भर शोर मचायेंगे।”7

छः से लेकर दस वर्ष तक के बच्चों में उत्सुकता, तार्किकता तथा कल्पना शक्ति का विकास तेजी से होता है। इस आयु वर्ग के बच्चों में सीखने, समझने तथा बड़ों की नकल करने की प्रवृति होती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि इनमें सकारात्मक सोच वाला, संस्कार प्रधान और उद्देश्यपरक कविता की रचना की जाय, साथ ही साहित्य के प्रति जिज्ञासा आकर्षित करनेवाला होना चाहिए। मानव मूल्यों तथा राष्ट्र गौरव के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने वाली कविताओं का भी समावेश होना चाहिए, क्योंकि इस समय इनकी मानसिक चेतना काफी प्रखर होती है। कन्हैयालाल मत की कविता ‘किसने यह दीवार बनाई’ में बच्चों का यह प्रश्न कितना मर्मस्पर्शी है-

“हृदय हमारे कोमल कोमल / है गुलाब के फूल सरीखे
हमसे दूर रहा करते हैं / द्वेष, दंभ के कांटे तीखे
हम सुगंध की थाती बनकर पुछ रहे हैं -बोलो भाई
हम बच्चों में भेदभाव की किसने यह दीवार बनाई।”8

वैश्वीकरण के इस युग में मध्यम वर्ग के बच्चे अधिक कुंठित है, क्योंकि इस वर्ग के माता-पिता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रगति के दौड़ में अपनी महत्वाकांक्षा के चलते बच्चों को महंगे स्कूलों में दाखिला तो करवा देते हैं, लेकिन आज की मंहगाई के दौड़ में स्कूल के नित नए मांगों को पूरी करने में सक्षम नहीं पाते हैं, जिसका असर इन वर्ग के बच्चों की मनःस्थिति पर पड़ता है -
“माता जी झल्लाती रहती, बाबूजी गुस्साते,
नहीं किसी पर वश चलता है, हम पर रोब जमाते।
किसी-किसी दिन तो फोकट में, हम पिट जाते भाई,
दिन पर दिन बढ़ती मंहगाई, कैसी आफत आई।”9
        सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में बच्चों को बाजार पर ज्यादा निर्भर बना रहे हैं। अगर बच्चा कोई प्रशंसनीय कार्य कर लेता है तो उसे प्रोत्साहित करने के लिए मोबाइल, कम्प्युटर लाकर देते हैं या होटल तथा मॉल ले जाते हैं। पांच से बारह वर्ष की आयु ऐसी होती है, जिसमें जो आदत पड़ गई, वह ताउम्र साथ निभाती है। प्रौद्योगिकी की इस अनोखी दुनिया ने बालक की मानसिकता में भी बदलाव ला दिया है। नागेश पांडे की यह कविता देखिए -

“मोबाइल जी, तुम हो सचमुच बड़े काम की चीज़।
गेम, कैमरा, कैलकुलेटर, एफ.एम., इंटरनेट।
कम्प्यूटर भी इसमें आया फिर भी सस्ता रेट।”10

बच्चे जब किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं, उस समय लगभग ग्यारह बारह वर्ष के होते हैं। इस समय तक बच्चे ज्यादा गंभीर तथा तर्कशील हो जाते हैं। मानसिक तथा शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से पुष्ठ एवं परिपक्व हो जाते हैं। इसलिए इनके लिए रचित कविताओं में तार्किकता, गंभीरता, सामाजिकता तथा वैज्ञानिकता का समावेश होना आवश्यक है। इस उम्र में बच्चों को कदम-कदम पर भ्रष्टाचार, अत्याचार, अन्याय, प्रतिस्पर्धा, आतंक और अनैतिकता जैसे समस्याओं से जूझना पड़ता है, इसलिए इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यावहारिक तौर पर सामाजिकता तथा राष्ट्रीयता के हित के लिए जो वरेण्य हो, उसे ही कविताओं में समाविष्ट करना चाहिए। रामअवतार त्यागी की कविता ‘समर्पण’ में यह भाव देखा जा सकता है -

मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, 
तुझे कुछ और भी दूँ।”11

हरिवंशराय बच्चन भी इन उम्र के बच्चों की मानसिकता से अच्छी तरह से परिचित थे। बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी कविता ‘कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती’ काफी प्रेरणादायक है।
“नन्हीं चीटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती।”12

वस्तुतः बच्चों में केवल जिज्ञास का संसार ही नहीं होता, बल्कि उनके भीतर का गुस्सा, रूठना-मानना, सपनों तथा इच्छाओं का संसार, यहां तक की कुछ कर गुजरने की चाहत भी होती है। अतः बाल साहित्यकारों की कविताओं में बालमन की सरल जिज्ञासा तथा कौतूहल हो, साथ-साथ तार्किकता तथा विज्ञानसम्मता भी हो, जिससे बच्चों की सकारात्मक कल्पना शक्ति को बढ़ावा मिले।

संदर्भ -

1. ‘वैश्वीकरण और हिंदी बाल कविता’ (लेख); उषा यादव (ले0) ‘आजकल’, योगेन्द्रदत्त शर्मा (सं.), वर्ष-65, पूर्णांक 781, नवंबर-2009, पृ. 12
2. ‘झांसी की रानी’ (कविता),सुभद्राकुमारी चौहान, मेधा, भाग-8, सोमदत्त शुक्ल (सं0), संस्करण-2012 कृति प्रकाशन, लखनऊ, पृ. 125
3. ‘वैश्वीकरण और हिंदी बाल कविता’ (लेख); उषा यादव (ले0) ‘आजकल, योगेन्द्रदत्त शर्मा (सं0), वर्ष-65, पूर्णांक 78, नवंबर-2009, पृ. 12
4. ‘ऐसा हो बच्चों का साहित्य’,अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन, आजकल, फरहत परवीन (सं0), नवंबर-2014, अंक-7, वर्ष-70, पूर्णांक-536
5. ‘हिंदी बाल कविता के सामाजिक सरोकार’, उषा यादव, ‘आजकल’, योगेन्द्र दत्त शर्मा (सं0), वर्ष-63, अंक-7, पूर्णांक-757, नवंबर-2007, पृ. 22
6. ‘आओ गीत गुनगुनाएँ’-1, दीपु प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 7
7. वही, पृ. 15
8. ‘हिंदी बाल कविता के सामाजिक सरोकार’; उषा यादव, ‘आजकल’, योगेन्द्र दत्त शर्मा (सं0) वर्ष-63, अंक-7, पूर्णांक-757, नवंबर-2007, पृ. 23
9. वही, पृ. 21
10. ‘बच्चा एक अलग इकाई है’; क्षमा शर्मा, ‘आजकल’, फरहत परवीन (सं0), वर्ष-70, अंक-7, पूर्णांक 836, नवंबर-2014, पृ. 6
11. ‘मेधा’,भाग-8, आचार्य सोमदत्त शुक्ल (सं0), संस्करण-2012, कृति प्रकाशन, वाराणसी, पृ. 64
12. ‘स्निग्धा’; हिंदी पाठमाला-7, उदयन त्रिपाठी (सं0), संस्करण-2014, फ्रेंड्स पब्लिकेशन्स, आगरा, पृ. 79



शबनम तब्बसुम
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,अलीगढ़

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