‘न घर के न घाट के’ को पढ़ते हुए

      ‘न घर के न घाट के’ कहानी संग्रह को पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। जिसे मेरे आदरणीय गुरूजी मेराज अहमद ने लिखा है जो कि वर्तमान में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं। वैसे तो यदा कदा उनकी क़लम समाज के कड़ुवे सत्य को उजागर करने के लिए चलती ही रहती है परन्तु ‘न घर के न घाट के’ नामक कहानी में सामाजिक सत्यता के साथ-साथ व्यक्ति की आरम्भिक असफलता से पनपी निराशा, हताशा,  नीरसता आदि का सजीव चित्रण किया गया है। इस कहानी में वसीम केंद्र बिंदु है ‘असद’ और ‘मैं’ उस केंद्र बिंदु के दो छोर। ‘मैं’ के द्वारा कहानी कहना एक शैली है जिसमे मैं कहानी का एक पात्र होता है। इस प्रकार इस कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं ‘मैं’, ‘असद’ और ‘वसीम’।
यदि इन तीनों पात्रों का रिश्ता देखा जाए तो कहानी के माध्यम से पता चलताहै कि ‘वसीम’ और ‘मैं’ बचपन के घनिष्ठ मित्र हैं। दोनों ने साथ में बहुत वक्त बिताया है। दोनों एक-दूसरे को समझते हैं। असद ‘मैं’ का दूर के रिश्ते में भाई लगता है पर उसके लिए मित्र जैसा है। असद का पता नहीं पर ‘मैं’ और वसीम की शादी हो चुकी है। असद, मैं और वसीम तीनों बड़े हो चुके थे और अपनी-अपनी नौकरियों के कारण एक-दूसरे से जुदा अलग-अलग शहरों में रहा करते थे।
‘मैं’ इस कहानी का बड़ा ही रोचक पात्र है। कहानी को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि इस ‘मैं’ को बचपन से ही यारबाजी का बड़ा ही तगड़ा शौक था और इस यारबाजी ने कुछ किया हो या नहीं किया हो, पर जनबा की बेग़म साहिबा के नाक में दम ज़रूर कर रखा था। मैं को नए-नए लोगों से मिलना, बीती हुयी बातों को याद करना आदि का बड़ा शौक था।
        ‘मैं’ और वसीम बचपन में बड़े मज़े में रहा करते थे। दोनों के बचपन के दिन लगभग एक जैसे थे। ‘मैं’ अपनी ननिहाल में रहता था और वसीम अपने भाई की ससुराल में रहता था। गॉव से हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद वसीम डिप्लोमा करने इलाहाबाद चला गया और ‘मैं’ उसी साल इंटर करके आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ आ गया।
        ‘मैं’ और वसीम ने बचपन में काफी वक्त साथ में बिताया था। इसलिए दोनों में एक दूसरे से मिलने की उत्सुकता दूर रहकर भी बरकरार बनी रही। ‘मैं’ के पास जैसे ही खरचे के लिए थोड़े बहुत पैसे हो जाते वैसे ही वसीम का हाल लेने इलाहाबाद पहुच जाता। यही हाल वसीम का था। वह भी ‘मैं’ से मिलने अलीगढ़ आता रहता था। जब दोनों मिलते तो महफि़ल जमती, हॅसी-ठट्ठा होता, ताशबाजी चलती, इश्क-मौहब्बत की बातें होतीं। एक-दूसरे को कुरेद-कुरेद कर बातें उगल बायी जाती। वसीम का तो ये हाल था कि अपनी कहानियों को दुबारा-तिबारा यहॉ तक कि बार-बार सुनाता। कुलमिलाकर इतने दिनों तक दूर रहने की कसर एक ही दिन में पूरी कर लेने का प्रयास होता था।
        इधर लम्बे अरसे से दोनों का मिलना नहीं हुआ था। जबसे दोनों की नौकरी लग गयी और शादी-विवाह हो गया तब से तो एक-दूसरे से फोन पर बात करना, कभी मिलने जाना या फिर एक-दूसरे को बुलाना सबकुछ छूट चुका था। ‘मैं’ एक बार गॉव से शहर जा रहा था तब उसने वसीम को एक बस में देखा था। ‘मैं’ उससे मिलने गया पर वसीम की बस छूटनेवाली थी, तो ‘मैं’ ने उसका फोन नम्बर ले लिया। वसीम के बगल में बुर्का पहने हुए उसकी पत्नी बैठी थी। वसीम इस बार बुझाबुझा सा लगा था। उसके सर के बाल उड़ चुके थे। अब वह उम्रदराज़ सा लगने लगा था। उसके चेहरे पर अजीब सी उदासी थी।
    ‘मैं’ के विषय में कहानी के माध्यम से पता ही है कि एक नम्बर कायरबाज था। इसलिए ‘मैं’ ने ही वसीम से मिलने की उत्सुकता दिखायी। ‘मैं’ के कार्यालय का कुछ काम निकल आया था जिसके कारण उसे राजधानी के शहर में जाना था। यह कार्यालय का काम तो एक बहाना था। दरअसल ‘मैं’ को तो वसीम से मिलने का उतावलापन था। वसीम राजधानी के ही शहर में रहता था। असद भी राजधानी के ही शहर में रहता था। ‘मैं’ सबसे पहले असद के पास पहुचता है और अब उसी को साथ लेकर उसे वसीम के यहॉ जाना था।
       ‘मैं’ जबसे असद के पास आया था, तबसे वसीम के विषय में ही बातें  किये जा रहा था कि वसीम और मैं साथ में पढ़ते थे । उसका गली की लड़की से चक्करथा। डिप्लोमा करने के बाद उसे तुरन्त नौकरी नहीं मिली थी। उसने अपनी मर्जी से तमाम नाते-रिश्तों और लोगों की भावनाओं को आहत करते हुए शादी की थी। जबकि उसके चाचा अपने ही खानदान की किसी लड़की से उसकी शादी की बात कर चुके थे। वो कभी-कभी मुझसे चिड़ता भी था, क्योंकि मुझे उससे पहले नौकरी जो मिल गयी थी आदि आदि।
        ‘मैं’ वसीम से मिलने के लिए बहुत उतावला था। वह यही सोच रहा था कि इतले सालों के बाद वसीम से मिलेगा। जाते ही वसीम उसे गले से चिपका लेगा। महफि़ल जमेगी, ताशबाजी होगी, गुजरे हुए दिनों की बातें होंगी, भाभी से मुलाका़त करायेगा, साथ में घूमेगा-फिरेगा और खूब मस्ती करेंगे। सालों से न मिलने की कसर एक ही दिन में निकाल लेंगे। लेकिन ‘मैं’ को कया पता था कि उसके सारे अरमानों पर पानी फिरनेवाला है; उसकी सारी उत्सुकता नीरसता में तब्दील होनेवाली है।
        वसीम अपने घर के दरवाजे पर खड़ा असद और मैं की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी दोनों आ जातेहैं। ‘मैं’ तो चाहता था कि उसके गले से लिपट जाए पर वसीम उनसे मिलने के लिए फट से हाथ आगे बड़ा देता है। वह दोनों को अन्दर ले जाता है और फिर औपचारिकताओं का दौर शुरू होता है। वसीम खबर-खैरियत की रस्मी बात करके चाय-पानी की व्यवस्था के लिए जाताहै। मैं जो सब कुछ सोचकर आया था, जिस गर्मजोशी से उसने असद को वसीम के बारे में बताया। वो सब उसे महज औपचारिकता के रूप में मिला। जैसे ही मैं पुराने किस्सों को छेड़ता वसीम बात टाल देता। आज अभी क्या चल रहा है पूछता तो उत्तर मिलता सब ठीक चल रहा है। वसीम बहुत निराश था। अब उसका जीवन पूर्णरूप से बदल चुका था और इस बदलाव का कारण उसकी आरम्भिक असफलताए थी। वसीम अपनी जि़ंदगी में जो चाहता था उसे वो मिला नहीं। इस कारण वह कुण्ठित हो गया था। शादी अपनी मर्जी से की थी। इस कारण रिश्तेदार, घर वाले साथ छोड़ चुके थे। उसे जब चीजों की ज़रूरत थी तब उसे चीज़ें नहीं मिलीं। इस सबका परिणाम यह हुआ कि वह अपने आपमें सीमित हो चुका था।
        और इस प्रकार ‘मैं’ ने अपने हॅसमुख दोस्त, ताशबाजी करनेवाला दोस्त, हॅसी-ठट्ठा करनेवाला दोस्त, इश्क-मौहब्बत की बातें करनेवाला दोस्त, साथ में घूमने-फिरनेवाले दोस्त को सदैव के लिए खो दिया। ‘मैं’ वसीम के यहॉ गया तो गर्म जोशी, उत्सुकता और उतावलापन लेकर परन्तु लौटा नीरसता, निराशा और पुराने मित्र को खोने के ग़म के साथ।

आशीषकुमार ‘अभिनव’
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

0 comments:

Post a Comment