कमनीय जीवन

मंदिरो की टनटनाती घंटियों का स्वर न भाता
कोई भी कमनीय प्रतिमा परन अब माला चढ़ाता
एक ही से पुष्प सारे ईश के हैं शीश सजते,
नित्य आनव भक्त एक ही देव के है गीत गाता
और अब उस देव को सब लग रहे हैं भक्त भारी,
कौन ऐसा भक्त जो नई रीति से पूजा करेगा
कौन बिरले पुष्प में फिर से नया सौरभ भरेगा।

मानता मानव अभी तक भाग्य में ही पूर्ण है बल
पग बढ़ाकर भी न माने पथ सही पर वहरहाचल
धारणा सारी गलत संग चल रहीं उसकी सदा,
आसमाँ में है चमकता क्या न तारक स्वयं में जल
पग बढ़ाना चाहता है किंतु कोई थाम लेत,
है अमर यदि ख्याति कोई कार्य से पाकर मरेगा
कौन बिरले पुष्प में फिर से नया सौरभ भरेगा।

एक नाविक है किनारा पा मगर वह शांत रहता
किन्तु सागर मध्य लहरों में वो हर्षितचित्त बहता
वहन तूफानों से डरता लहर से भयभीत कब है,
एक जीवन की तलब में देह लहरों में है दहता
एक भी उच्छ्वास उसका क्या न दुःख से पूर्ण होता,
प्राप्त जीवन ही को करने भव्य सागर वहतरेगा
कौन बिरले पुष्प में फिर से नया सौरभ भरेगा।

भावुकशर्मा
बी.ए. प्रथमवर्ष
17A, कृष्णाधामकॉलोनी, आगरारोड़, अलीगढ़

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