दावा

करते हो तुम विश्वास का
परन्तु तुममें भरा है अविश्वास,
माना विक्षिप्त हूँ मैं
करूँ मैं कैसे विश्वास तुम्हारा
तुम और तुम्हारा शहर
नहीं है मेरे विश्वास का पात्र।

कुरुक्षेत्र
हर एक में
कहीं भीतर ही
होता है कृष्ण
और होता है
एक
निरंतर महाभारत
भीतर ही भीतर,
क्यों ढूढते हैं हम सारथी
जब
स्वयं में है कृष्ण,
मैं तुम
और
हम में बटा
ये चक्रव्यूह
तोड़ता है
भीतर का ही अर्जुन,
माटी है
और सिर्फ माटी है
हर रोज यहां देखता हूँ
मैं तुम और हम का कुरुक्षेत्र !!

रौशन जसवाल ‘विक्षिप्त’
सम्पर्क, शान्त कंवल कुंज, ढली शिमला

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