मेरे लेखन के स्वर्णिम क्षण

अवसर न मिलने की शिकायत अवसरवादी लोग करते हैं। मुझे कदम कदम पर अवसर मिले, बांहें फैलाए। मुझे धीरे धीरे यह भी पता चला कि किसी भी लेखक की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा किन्हीं विशेष अवसरों पर उरूज पर होती है। ये अवसर हैं नए साल की शुभकामनाएं, होली दीवाली ईद बैसाखी आदि त्योहारों की बधाई, मुंडन कनछेदन शादी आदि संस्कारों के निमंत्रण पत्र, शोक संदेश, प्रेम पत्र आदि।इन मौकों पर अनेक लेखकों ने शब्द की सार्थकता मार्मिकता प्रमाणित की है। यह बात मैं अनुभव से कह सकता हूं।मैं स्वयं इस लेखन से जुड़कर वर्षों तक मां भारती का भंडार भरता रहा। ऐसे जनोन्मुख लेखन में मेरा भी कालजयी योगदान है। वैसे तो मेरे लेखन के अनेक स्वर्णिम क्षण हैं। लेकिन मैं केवल दो तीन आयामों तक इसे सीमित रखू़ंगा। अगर कोई मेरे इस लेखन पर शोध करना चाहे तो शीर्षक होगा--विदा से अंतिम विदा तक।
दरस्ल, ऐसे जनोन्मुख लेखन से जुड़े लोग मूक सेवक होते हैं। अपना नाम नहीं चाहते। एक तरह के लोक साहित्यकार। किसी समय निमंत्रण पत्रों में राष्ट्रीय महत्व प्राप्त इन पंक्तियों का लेखक कौन है, आज कोई नहीं बता सकता--'भेज रहा हूं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को, हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को। 'कोई इन्हें सामान्य पंक्तियां समझने की भूल न करे। एक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने तो बाकायदा इसपर सेमिनार कराया था।कि 'हे मानस के राजहंस 'होगा या 'हो मानस के राजहंस' होगा। पूरे दिन की उच्चस्तरीय बहस के बाद तीन प्रोफेसरों वाली बेंच ने स्पष्ट निर्णय सुनाया था। उनके अनुसार इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं है। दोनों हो सकते हैं। बहस करते हुए एक अध्यापक ने अद्भुत शोध किया था कि यह श्रेष्ठ कविता संभवतःतुलसीदास की है। रामचरितमानस और मानस में साम्य है। इतने बड़े कवि के लिए कुछ भी कर गुजरना असंभव नहीं। किसी ने उनकी कविता का खड़ी बोली में अनुवाद कर दिया है। उस बहस के बाद निमंत्रण पत्रों में विकसित हिंदी कविता के प्रति मेरा आदर बढ़ गया था।
इस बात को लेकर आप अधिकांश हिंदी अध्यापकों के प्रति सुख संतप्त महानुभूति से खुद को भर सकते हैं कि उनके होने मात्र से मुहल्ले या कॉलोनी में भाषा और साहित्य का स्तर कहां से कहां पहुँच जाता है। उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि शादी ब्याह वग़ैरह के मौके पर लीक से हटकर कार्ड का मैटर बना दें।कल्पना करना कठिन ही होगा कि लीक के भीतर घुस कर होनेवाली शादियों के कार्ड लीक से हटकर बनते हैं। वाह।
वैसे यह बहुत आनंदपूर्ण काम है।मनोरंजन शब्द ने आनंद को भगा दिया है इसलिए यह मनोरंजक काम है। कुछ गैर ज़िम्मेदार अध्यापकों को छोड़कर बहुतेरे ऐसे जनोपयोगी साहित्य की रचना और इसी स्तर की अध्यापन पद्धति से शिक्षा का ललाट सपाट कर रहे हैं। फिर भी, इस क्षेत्र में होने वाले नूतन प्रयोगों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। जैसे 'मेले मामा की छादी है। जलूल जलूल आना'--एक ऐसा ही विचारोत्तेजक प्रयोग है। विदाई के लिए 'भीगी पलकें' या 'तारों की छांव में' का इस्तेमाल भी चर्चित रहा है। एक बार विदाई के लिए 'पालगोमरा की पालकी' का भी इस्तेमाल एक जादुई अध्यापक ने किया था। इस प्रयोग का जर्मन भाषा में अनुवाद भी हुआ।
ऐसे ही मौलिक प्रयोग करने वाले एक गुरुदेव के संरक्षण में मुझे इस महान लेखन का गुरुमंत्र मिला था।यह शिक्षा आगे बहुत काम आई। गुरुदेव 'वियोगी होगा पहला कवि' से 'वियोगी होगा पहला कार्डकार' तक आ चुके थे। यह शब्द साहित्यकार के वजन पर है। वैसे कुछ लोग अपने लेखन में भी कार्डमैटर ही लिख रहे हैं। तो किस्सा यह कि गुरुदेव एक लड़की से बेपनाह किस्म का प्यार करते थे। इतना कि एक दिन वह लड़की पनाह मांगने लगी। गुरुदेव ने 'आह और पनाह' शीर्षक से एक लंबी कविता भी लिखी। कविता मोहल्ले में फेमस हुई। फिर एक दिन लड़की का पिता आया। उसने कहा, आपकी किस्मत भले न अच्छी हो आपकी हिंदी अच्छी है। एक शादी के निमंत्रण पत्र का मैटर बना दीजिए। पूछा गया, किसकी? जवाब में पिता ने अपनी लड़की का नाम बताया।
गुरुदेव के अनुसार उन्होंने दिल पर लोहा, कलेजे पर पत्थर, दिमाग पर रद्दी किताबें रखकर मैटर बनाया। वे अपना लिखा कार्ड लेकर शादी में गये। दबाकर खाना खाया। लिफाफा दिया। घर लौटे। मैंने पूछा था कि वह बेपनाह प्रेम कहां चला गया था। वे मुस्कुराए थे। ऐसा है, प्रेमिका को भूलने के नुस्खों पर एक लंबा लेख लिख रहा हूं। एक नुस्खा बताता हूं। मैंने एकांत में लड़की की फोटो को घृणा से देखा। जा, तू मेरे लायक थी ही नहीं। हह। हुह। हुम्म। कपड़े पर छूटा प्रेम का दाग साबुन से और मन पर छूटा दाग घृणा से दूर होता है। मैंने उसकी कल्पना एक दुश्चरित्र लड़की के रूप में की। ऐसा करने से मन को सुख मिलता है। प्रेमिका को भूलने में मदद मिलती है। जो ख़ुद को हासिल न हो सकें वे लड़कियां चरित्रहीन ही होती हैं। ऐसा अनुभवी समाज का कहना है। तो, ऐसे चरित्रवान गुरु ने मुझे स्वर्णिम लेखन के विविध आयाम समझाए। उनकी सलाह पर चल कर कुछ समय बाद मुझे प्रेमपत्र की विधा में उदीयमान या नवोदित रचनाकार मान लिया गया।
मेरी विनम्रता देखिए कि मैं चुपचाप प्रेमपत्र साधना में लगा रहता था।मुझे लेकर आलोचक प्रेमकार दो गुटों में बंट गये। एक का कहना था कि यह लेखक शोक प्रस्ताव विधा में भी हाथ आज़मा सकता है। बाद में मैंने आज़माए भी। एक जगह तो मैं लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचा। जिस लड़की को मैं पत्र लिखता था वह अपने साहित्यप्रेमी पिता को भी पढ़वा देती थी। आलम यह कि लड़की से अधिक उसके पिता को मेरे प्रेमपत्रों की प्रतीक्षा रहने लगी। उन दिनों मेरी इच्छा होती कि 'मेरे लोकप्रिय प्रेमपत्र' शीर्षक से एक किताब छपा डालूं।
लड़की के पिता कहते कि वैसे तो लड़का लंपट है, मगर भाषा बहुत अच्छी है। वाक्य लच्छेदार बनाता है। विदेशी भाषाओं के उद्धरण भी देता है। बिट्टो से अगले दिन मिलने का समय तय करते हुए विखंडन और भूमंडलीकरण तक जा पहुंचता है और क्या चाहिए। पिता कभी कभार टाइप के भूतपूर्व फ्रीलांसर थे। वे एक फ्रीलांसर प्रेमी का संघर्ष भलीभांति समझते थे। उनका कहना था जब लेखन में कुछ लंपट केवल इस आधार पर सम्मानित हैं कि उनकी भाषा अच्छी है तब प्रेम में ऐसा क्यों नहीं हो सकता।उनकी पूरी सहानुभूति मुझे मिली। बस बिट्टो नहीं मिली। कहना न होगा कि मुझपर क्या बीती। फिर मैंने दूसरी परंपरा की खोज की। अब मेरे प्रेमपत्र दूसरी के पास पहुंचने लगे। मैंने सुख और शोक दोनों को साध लिया।
बहरहाल, यह अभ्यास मेरे बहुत काम आया। दिल्ली में जब एक प्रतिष्ठित पुरस्कार देने वाली संस्था में नौकरी करने गया तो पूछा गया था कि क्या आपको प्रशस्तिपत्र और शोकसंदेश लिखने का अनुभव है। जब मैंने कारण जानना चाहा तो बताया गया कि हम प्राय:उम्रदराज़ लोगों को ही पुरस्कार देते हैं। तय करते के साथ प्रशस्तिपत्र और शोकसंदेश लिखवा कर रख लेते हैं। जाने कब अपूरणीय क्षति हो जाए। प्रशस्ति तो ख़ैर कई बार लेखक ख़ुद लिखकर दे देता है, मगर शोकसंदेश हमें तैयार कराना पड़ता है। शोकसंदेश की गुणवत्ता की जांच के लिए हमने दो सदस्यीय शोकपीठ बना रखी है। यह बात उन्होंने उल्लास के साथ कही।मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं शोकपीठ को ख़ुश रखूंगा। साक्षात्कार लेने वाले एक शख़्स ने कहा कि कल एक शोक संदेश लिखकर दिखाना। मैं सिर हिलाकर शोकाकुल हुआ। मुझे काम मिल गया। अन्य दायित्वों के साथ मुझे 'शोक प्रकाशन प्रभारी' बनाया गया।
यहां भी मेरे गुरु की शिक्षा काम आई। गुरु ने कहा था कि अगर अच्छा शोक संदेश लिखना हो तो अच्छे से मूड बनाना।उदास कॉफ़ी पीना। पुरस्कृत या पुरस्कारातुर कविताएं पढ़ना। शोक के मैनेजमेंट पर विचार करना। ऐसा ही किया। अगले दिन लिखकर ले गया। शोकपीठ के दोनों ने ख़ुशी ज़ाहिर की। मगर चंद हिदायतें दीं। मैंने संदेश शब्द में स पर बिंदी लगाई थी। वे बोले,' स के आगे आधा न लगाओ। हम आदमी का मरना सहन कर सकते हैं, भाषा का मरना नहीं। पर्यायवाची तैयार करो। निधन, नहीं रहे, देहावसान, महाप्रयाण, देहांत के अलावा भी खोजो। मृत लेखक के लेखन में भले वैविध्य न हो, उससे जुड़े शोक में वेराइटी होना चाहिए। ' मैंने उत्साह से कहा कि यह वाक्य कैसा रहेगा--'बड़े आश्चर्य की बात है कि काल ने उनके जीवन की हत्या कर दी। 'वे उछल पड़े। बोले, इस एक वाक्य पर तुम्हें कविता के कई पुरस्कार मिल सकते हैं। मैं पास हुआ।
बहुत वर्षों तक मैं सानंद शोक संदेश लिखता रहा। कोई लेखक मित्र मिलता और पूछता कि आजकल क्या लिख रहे हो। मैं कहता आजकल एक निमंत्रण पत्र या शोकसंदेश पर काम कर रहा हूं। वे ख़ुश होते। कहते मन लगाकर काम करना। सलाह देकर जाते कि नेकी कर शोक संदेश में डाल।
अपने पर घमंड नहीं करता मगर इन दो आयामों के अतिरिक्त होली दिवाली नये साल पर लिखी मेरी काव्याकुल शुभकामनाओं ने भी कामना के नये प्रतिमान बनाए हैं। उम्मीद है मेरे स्वर्णिम लेखन पर पाठकों की नज़र जाएगी। आमीन।

सुशील सिद्धार्थ
08588015394
sushilsiddharth@gmail.com

इस दीपक में तेल नहीं...

भारतीय राजनीति में नारों का इतिहास चुनावों से बहुत पुराना है |पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र, उनकी नीतियाँ सब अपनी जगह पर होते हैं मगर चुनाव में समां बाँधने का काम चुनावी नारे ही करते नज़र आते हैं | किसी भी पार्टी का काम बगैर नारों के नहीं चल सकता | इसके लिए हाईकमान बड़े बड़े लिक्खाडों को हायर करने तक तैयार रहते हैं | यह नारे ही उनकी हार या जीत सुनिश्चित करते हैं | नारे बहुत कुछ कर सकते हैं | इस देश में नारे ही असली माहौल बनाते हैं | नारा महिमा अपरम्पार है | नारे हैं तो हम हैं | सोशल मीडिया के इस क्रांतिकारी युग में आज भी परम्परागत नारों का महत्त्व कम नहीं हुआ है | भारतीय लोकतंत्र में राजनीति की गाड़ी नारों के भीड़तंत्र के पीछे-पीछे चलती है |
ज्यादा पीछे न जाते हुए हम नारों के पिछले सौ साल के इतिहास पर जाएँ तो जब तिलक ने स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कहा तो देशवासियों को अपने अधिकारों का ध्यान आया नहीं तो हम गुलामी के अभ्यस्त हो चुके थे | एक नारे के बल पर अधिकार नाम की चिड़िया से हमारा परिचय कराने के कारण बाल गंगाधर तिलक इतिहास में अमर हो गये | एक मुकम्मल नारा देने से पहले नेतागण पहले किसी स्थान विशेष पर जनता को एकत्र करने के लिए पहले कोई उपनारा देते हैं जैसे स्वतंत्रता संग्राम के वक्त नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने पहले कहा दिल्ली चलो और और लोग दिल्ली की ओर कूच कर दिए | इसके बाद नेताजी ने अपना चिरस्मरणीय नारा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा दिया | इधर नेताजी यह नारा लगाकर हमारे सोये हुए जमीर को जगा रहे थे वहीं दूसरी ओर अपने गांधी बाबा ने करो या मरो के बाद अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसे अविस्मरणीय नारों की रचना कर एक बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया और उन्होंने सत्य और अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को यहाँ से भगाकर ही दम लिया |
देश तो स्वतंत्र हो चुका था | लगा था कि नारों का काम भी ख़त्म हुआ लेकिन नहीं | नारे कभी नहीं मरते | देश की आज़ादी के पहले जितने नारे लगते थे अब उससे दुगुनी मात्रा में नारे लगने लगे | देश की चुनौतियां नारों में तब्दील होकर सामने आईं | लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा लगाया जिसे बाद में अटल जी ने जय जवान जय किसान जय विज्ञान में तब्दील कर अपना नाम दिया | तमाम प्रयासों के बावजूद समस्याओं ने विकराल रूप धारण कर लिया | तीन तीन युद्ध और बीमारी तथा गरीबी से जनता त्राहि-त्राहि कर उठी | ऐसे समय में इंदिरा गांधी का उदय हुआ और उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया | उन्होंने कहा चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें | कांग्रेस की तरफ से जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर जैसे नारे लगाये जाने लगे | जिसका प्रभाव भी चुनाव बाद देखने को मिला | लेकिन यह जनता है सब जानती है खाली नारे ने उसका पेट नहीं भरता | लुभावने वादों और जोशीले नारों से आप कुर्सी तो पा सकते हैं लेकिन लम्बे समय तक जनता का प्यार नही | जनता का इंदिरा से मोहभंग हुआ और आपातकाल के बाद हुए चुनाव में दिनकर की प्रसिद्द कविता की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को ही नारा बना दिया गया | 
इस घटनाक्रम के बाद देश में कई क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हुआ | अब लड़ाई दो तरफ़ा न होकर चौतरफा थी | देश का आकाश नारों से गुंजायमान हो उठा | तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा लेकर बीएसपी सामने आई | बीएसपी का यह नारा सीधा-सीधा जात-पात के सियासी गणित पर आधारित था | इस नारे को फेल होता देख बीएसपी ने फ़ौरन अपना नारा बदल दिया और फिर एक साथ कई सारी आवाजें आई ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर’, ‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर’, ‘ब्राह्मण साफ़, ठाकुर हाफ, बनिया माफ़’, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ | नारों के माध्यम से लोग सियासी वाकयुद्ध करने में मुब्तिला हो गये | नारों का जवाब नारों से दिया जाने लगा | राजा नहीं फ़कीर है, देश की तकदीर है वीपी सिंह के लिए बनाया गया नारा था | जिसका जवाबी नारा – राजा नहीं रंक है देश का कलंक है बना | समाजवादी पार्टी भी नारे देने में पीछे नहीं रही | जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है उसका चुनावी नारा बना | यूपी में है दम क्योंकि यहाँ जुर्म है कम जैसे नारे देकर जनता को आकर्षित करने की कोशिश की गयी |
तत्कालीन इंदिरा सरकार को नीचा दिखाने के लिए नारा गढ़ा गया - खा गयी चीनी पी गयी तेल, ये देखो इंदिरा का खेल | गली-गली में शोर है नारे को तो हर विरोधी दल के नेता ने पकड़ लिया | नारों के द्वारा नेताओं ही नहीं बल्कि दलों को भी नीचा दिखाने की कोशिश भारतीय लोकतंत्र में शान से की गयी | एक ज़माने में जनसंघ ने नारा लगाया था – जली झोपड़ी भागे बैल, ये देखो दीपक का खेल | जवाब में कांग्रेस का नारा भी आया – इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं |
जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू जैसा नारा तो उस समय बच्चे-बच्चे की जुबान पर सुना जा सकता था | बिहार के एक और लाल रामबिलास पासवान के समर्थकों ने नारा बुलंद किया - धरती खोजे आसमान, पासवान-पासवान | कांग्रेस में इंदिरा के बाद राजीव गाँधी आये तो नारा दिया गया तूफ़ान में न आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी में |  जब सारे मुद्दे अन्य पार्टियों ने पकड़ लिए तो बीजेपी ने सत्ता प्राप्ति के लिए राम मंदिर का एक नया मुद्दा उछाल दिया और नारा दिया रामलला हम आयेंगें, मंदिर वहीँ बनायेंगें | एक तरफ उसके लोग अपनी पार्टी की हवा बनाने में लग गये वहीँ दूसरी ओर उसने कांग्रेस राज में हुए घोटालों को भी लेकर जनता के सामने पहुँची और उसने बोफोर्स घोटाले पर सरकार को घेरते हुए सेना खून बहाती है, सरकार कमीशन खाती है का नारा दिया |
नारा बनाना और फिर उसे अवाम तक पहुँचाना कोई हंसी ठट्ठा नहीं | नारे की सफलता इसी में हैं कि उसे बुलंद आवाज़ के साथ लगाया जाया | ख़राब हाजमे वाले नेताओं को नारा लगाने से परहेज करना चाहिए | वैसे भी नारे तो कार्यकर्ता लगाते हैं | नेता तो अपनी रणनीति के हिसाब से नारे सेट करता है और एक बार अपने भाषण के जरिये उस नारे का अपने मुखारविंद से लोकार्पण करता है | बाकी काम उसकी पार्टी का कार्यकर्ता करता है |
एक सफ़ल राजनीतिज्ञ बनने के लिए नारों का उचित ज्ञान अति आवश्यक है | मैं तो कहता हूँ कि सरकार को इसके लिए बाकायदा यूनिवर्सिटी में नारा विज्ञान की पढ़ाई करवानी चाहिए | जगह-जगह नारों के ट्रेनिंग सेंटर्स होने चाहिए जहाँ भावी नेतागण नारों का अभ्यास कर सकें |
अब देखिये न चुनावपूर्व हर हर महादेव से हर हर मोदी निकला और चुनाव बाद मोदी घर-घर पहुँच गये |अब जनता मोदी से उनके चुनावी वादों का जवाब माँग रही है और मोदी जी घर से ज्यादा बाहर बिजी हैं | वह कांग्रेस की जिन योजनाओं को पानी पी-पीकर कोसते थे उनमें उन्हें आज अच्छाईयाँ नज़र आ रही हैं |
जेएनयू फेम कन्हैया कुमार ने ज्यों ही नारा लगाया कि हम लड़ के लेंगें आज़ादी | वह पूरे देश भर में मशहूर हो गये | भला इससे पहले उन्हें कौन जानता था | यह नारे का ही चमत्कार था जिससे देश के सारे मुद्दे ख़तम कर दिए और सबको केवल जेएनयू का मुद्दा ही नज़र आने लगा | कन्हैया – तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है, देश की चिंता किसे है | तुम्हें प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर नारे का शुक्रिया अदा करना चाहिए |आज़ादी के इन नए नारों की शुरूआत के लिए देश आपका कोटि कोटि धन्यवाद ज्ञापित करता है |
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राहुल देव
संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203
मो.– 09454112975
ईमेल-rahuldev.bly@gmail.com

हौसला

आँधियाँ पूछती नहीं रास्ता फ़िज़ाओं से
पंछियों ने कब मांगी परवाज़ हवाओं से।

धधकती कोशिशों को बुझाने की औकात नहीं इनकी
डर न जाना रात को गरजती घटाओं से।

सुलगने दो सीने में सुलगते अंगारों को
कबतक लोगे रोशनी बेनूर सितारों से।

ऐ नाविक तू बीच समन्दर जंग का एलान कर
मांगना मत कोई मदद इन किनारों से।

हर मुश्किल को मात देगा हौसला बनाए रख
हारकर न बैठना इन सख्त सज़ाओं से।

उनको दुआ करने दे तू धार दे कटार को
किसने जीती जंग इनको री दुआओं से।


विनोद कुमार दवे
पाली, राजस्थान
मोबाइल - 9166280718
ईमेल - davevinod14@gmail.com

वतन

तिरंगा लहराता रहे सदा ऊँचे आसमान में
समन्दर भी चरणों में झुका जिसके सम्मान में।

वतन मेरा मेरे दिल में धड़कता रहे धड़कन बन
जीऊँ तो इसकी आन में, मरूँ तो इसकी शान में।

ये महकता चमन है मेरा वतन मेरा भारत
आज़ादी की खुशबु फैली है इस गुलिस्तान में।

बचन पाई कोई सभ्यता काल के प्रहार से
कामयाब रही ये संस्कृति वक़्त के हर इम्तिहान में।

कुदर तभी जिसके गुण गाती है पृथ्वी के कोने कोने
पर्वतों पर, नदी किनारे, खेत में,खलिहान में।

लहू बनकर रहता है मेरे रग रग में मेरा वतन
हवा बनकर बहता है प्रेम भारत महान में।

मौत आए तो आए इसी पावन धरा पर
मिटूँ इसी माटी में, जन्म लूँतो हिन्दुस्तान में।

विनोद कुमार दवे
पाली, राजस्थान
मोबाइल - 9166280718
ईमेल - davevinod14@gmail.com

ले तराश कर तुझे रख दिया

ले तराश कर तुझे रख दिया
अब तू बता कि मैं क्या करूँ ?

तुझे मान लूँ भगवान  या
किसी हादसे की दोआ करूँ ?

ले तराश कर तुझे रख दिया...
यही शर्त है, यही शर्त थी 

जो किसी ने ‘खूब’ बना दिया 
वो जो हाथ कारीगरों के हैं 

उसे काट दो, उसे काट दो I
ले तराश कर तुझे रख दिया...

न ही मेरा तार्रुफ़ अनलहक़
न ही मैंने खुद को भला कहा 

मैं एक प्यादा, गुलाम हूँ 
तुझे जैसे चलना हो चल मुझे I

ले तराश कर तुझे रख दिया...
न ज़ुबाँ मिरी न जिसम मिरा 

न ही रूह का हक़दार मैं 
जो बता मुझे वही बोल दूँ

तिरी नींद है तिरा ख़्वाब है I
ले तराश कर तुझे रख दिया...

मुझे होश है, बेहोश हूँ 
मुझे इसका भी तो पता नहीं 

मुझे लोग कहते रहे हैं क्यों 
मुझे क्या हुआ मुझे क्या हुआ 
ले तराश कर तुझे रख दिया..

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

रात ख़्वाब में तुम आये थे

रात ख़्वाब में तुम आये थे
बैठे थे सिरहाने मेरे
आहिस्ता सहलाते मेरे बालों को
बोसा देते गीत मधुर सा गाते थे
नर्म-सुफ़ैद रौशनी लेकर
चाँद ज़मीं पर आया था,
आँख खुली तो सिरहाना भी सूना था
बेतरतीब पड़े बिखरे थे बाल मेरे
और ज़बीं पे तपिश डालती किरणें थीं
आफ़ताब ने ख़्वाब जला डाला सारा
काश...न आँखें खुलती तो अच्छा होता
रात ख़्वाब में तुम आये थे....

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

मेरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता

मेरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता ?
मग़र मैं क्या करूँ, ख़ामोशियाँ तुमने नवाज़ी हैं 
कि जब मैं बोलता था प्रेम में डूबा हुआ पहले 
तुम्हारे पास रहकर भी तुम्हारे ख़्वाब में खोया 
न जाने क्या करूँ ऐसा कि तुम खुलकर हँसो जाँना 
तुम्हारी इक हंसी के वास्ते, सौ-बात बुनता था 
तुम्ही तो डाँटती थी ना मुझे कहते हुए ये कि 
ज़रा चुप भी रहो, कितना ज़ियादा बोलते हो तुम..
खबर तुमको नहीं होगी कि यूँ ख़ामोश होने में 
गला काटा है मैंने अपने ज़ज़्बातों-ओ-ख़्वाबों का 
दरेरे हैं ज़ख़म मैंने मिरे माज़ी से लेकर के 
बड़ी लाशें दफ़न कर के हुआ हूँ कब्रगाहों-सा 
तुम्हें मालूम है उनको दफ़न के वास्ते मैंने 
घसीटा है पकड़कर के ज़मीने-खार पे जाँना 
बड़े तेज़ाब डाले हैं जिसम-ए-चाक पे उनके 
कई बोटी में बाँटा और कुचला है उन्हें जाँना 
मुझे शक़ था कहीं थोड़ी बहुत भी जाँ रहेगी तो 
अगर ये फिर उठेंगे तो मुझे फिर से कहोगी तुम 
ज़रा चुप भी रहो, कितना ज़ियादा बोलते हो तुम
अभी ख़ामोश हूँ मैं और अब खामोशियों में गुम
मुझे ख़ामोशियाँ अच्छी सहेली सी लगी हैं अब 
सहर से शाम होती है गुज़र जाती है रातें भी 
मग़र ख़ामोश रहता हूँ किसी से कुछ नहीं कहता 
समझता हूँ बहुत अच्छा है ये ख़ामोश हो जाना 
सुनो ! जैसा कहा तुमने किया मैंने तो वैसा ही...
मिरा ख़ामोश रहना अब तुम्हे अच्छा नहीं लगता ?

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

मंसूबे होंगे तेरे कामयाब

मंसूबे होंगे तेरे कामयाब हौंसला तो रख
अपने दिल में ख़्वाबों का सिलसिला तो रख

फेंकदे अपने मन से बेदर्द नग्मों को 
अपने दिल में दर्द का एक फ़लसफ़ा तो रख

मैं खुद से जुदा नहीं, लेता विदा नहीं
आऊँगा वक़्त पर काम, ये भरोसा तो रख

नज़रअंदाज़ करने का तेरा अंदाज़ था बड़ा अच्छा
मेरी हर जीत पर अपना वो अंदाज़ बरकरार तो रख

मंसूबे होंगे तेरे कामयाब हौंसला तो रख
अपने दिल में ख़्वाबों का सिलसिला तो रख

बंदिशों की बेड़ियाँ अब कहाँ तेरे क़दमों में 
हसरतों की राह पर एक फैसला तो रख

मेहँदी पैरों में मुझे अच्छी नहीं लगती 
एड़ियों में पड़े छालों के कुछ निशान तो रख

बड़े बुज़दिल हैं वो जो डगमगा जाते हैं 
ज़िंदादिली का अपना एक प्रमाण तो रख

बड़े भयानक सफ़र में हैं वो जो ढूंढ़ते हैं हमसफ़र 
इस सफ़र में तू खुद को साथ तो रख

मंसूबे होंगे तेरे कामयाब हौंसला तो रख
अपने दिल में ख़्वाबों का सिलसिला तो रख।


नेहाल अहमद,
बी.ए. हिंदी ऑनर्स, 
प्रथम वर्ष, 
अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय, 
अलीगढ़  
मो: 09457922265 
thenehalahmad@gmail.com 

बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में

बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में
गुज़रती है हमारे दिल पे कैसी चाँद रातों में 
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें...
कोई ख़्वाबों में गुम होगा
कोई पहलू-ए- जाँना में
कोई ख़त पढ़ रहा होगा
कोई ख़त लिख रहा होगा 
किसी की धडकनें सुनकर
किसी को राहतें होंगी
कहीं गुल खिल गए होंगे
कहीं पर चाहतें होंगी 
कहीं काँधे पे सिर होगा
कहीं ज़ुल्फ़ों में ख़म होंगे
कोई माशूके-दिल होगा 
कोई जानो-सनम होंगे...
यहाँ रानाईयों में भी 
बड़ी ही दोज़खी-सी थी 
मुक़ाबिल ही मुकद्दर था 
सुकूँ से ही ठनी-सी थी 
निगाहों से मिलन भी था 
निगाहों से बिछोड़ा भी 
उसी इक रात में सब कुछ 
गज़ब का चाँद उजला था 
मगर वो रात काली थी 
मगर वो रात काली है...
किसी की बात मत छेड़ो 
नज़ारे और टूटेंगे 
सितारों से न कहना कुछ 
सितारे और टूटेंगे 
लबालब हैं तो रहने दो 
उन्हें भी है पता लेकिन 
सहारा दीजियेगा मत 
किनारे  और टूटेंगे 
यहाँ रुखसत भी रूठी है 
क़ज़ा भी मुँह फुलाए है 
कशमकश चील-कौओं-सी 
मुसलसल नोच खाए है....
बड़ी बरबादियाँ बरपी हैं 
मेरे दिल के हुजरे पे
तवायफ़ और क्या करती 
अगर जाती न मुजरे पे 
उसी के हाल जैसे ही 
हमारे हाल भी साहिब 
“वहीं घुँघरू समय के हैं 
वही कोठा ख़ुदा का है 
ख़ुदाई माँग करती है 
तवायफ़ बन तवायफ बन 
बने बैठे हैं आखिर हम 
तवायफ़ ही तवायफ़ ही...”
चलो छोड़ो अभी कुछ और भी जुड़ना है खातों में 
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में
गुज़रती है हमारे दिल पे कैसी चाँद रातों में I
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें...

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

नमाज़-ओ-आरती

नमाज़-ओ-आरती...
नमाज़ पढ़ते वक़्त 
न अल्लाह न रसूल 
न मौला ही कहा मैंने 
हाँ, वुजू किया था 
इत्र डाला हुआ था सर से पा 
नमाज़ी तो मैं पाँचो वक़्त का था 
कुरआन हाथ में लिए बैठे 
कर रहे थे याद सब अल्लाह को जिस वक़्त, मैं 
ले रहा था नाम अपने प्राणप्यारे राम का 
"एक मेरा राम बस उसके इतर कोई नहीं...."
फिर चला मस्ज़िद से दौड़ा 
पास के मंदिर तरफ़
हाथ धोये और आया गर्भगृह के सामने 
आरती होने लगी थी, 
गूँजती थी घंटियाँ 'श्री राम की' धुन में रमी
रोम मेरे उठ खड़े थे,
फिर न ही शिव नाम बोला  और ना ही राम ही 
हाथ जोड़े और अपनी प्रीत में खोते कहा 
"ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह..."
अब मुझे कुछ भी कहो 
अच्छा, बुरा, बहरूपिया 
जो भी हूँ जैसा भी हूँ
हिन्दू भी हूँ मुस्लिम भी हूँ....

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !

न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !
तुम्हारी याद तो आती है लेकिन
कसक, वो जो कि पहले थी
बहुत कम हो गई है अब...
तवे पर आँच में तपती हुई इक बूँद देखी है ? 
छनकती है जो रह-रह कर
तड़पती है, उछलती है, सिसकती है
मगर जो आँच बढ़ती ही चली जाये मुसलसल तो
यही होता है ना अंजाम आखिरकार जानानाँ !
छनकती बूँद, जल-भुन के हवा में डूब जाती है
अगर रहता है कुछ बाकी तो केवल एक धब्बा-सा
तवे पर, और जिसको अब तपिश बिलकुल नहीं लगती 
"कि जब तक जान होती है, तभी तक आँच लगती है"
सुनो ! वो बूँद मैं था....
सुनो ! वो बूँद मैं था....
न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं

और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं...
स्याह मंज़र और जुगनू भी नदारद

खंडहर उजड़ा हुआ जर्जर खड़ा था
एक परछाई कसी थी, बेड़ियों में

कसमसाती छटपटाती रो रही थी
ताक पर रक्खा हुआ था एक दीया

बुझ रहा था जल रहा था तड़फड़ाता
कुफ़्र दौड़ा आ रहा था बेमुरौव्वत

और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं.....
और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं...

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

आज़ादी

देश मेरा लुट गया है आज सबके सामने
आजादी गिरवी है आज कौड़ियों के दाम में।

शहीदों की रूह सरकारी कागजों में है दफ़न
विधवाओं के घर बिके है आज मेरे गाँव में।

दूध घी नदी की बात अब पुरानी हो चली
लौटते है अब गधे सूखे हुए तालाब में।

खेतिहर को हर गई खेती, कोने में टूटे हल है
घोड़े बेच सो रहे है चूहे जो गोदाम में।

बाड़ही चरने लगी है, खेत और खलिहान को
राजनेता बोलते है गुंडों के अंदाज में।

आज़ादी की मालियत आज मुझ से पूछिये
छेद ही गहने बने है आज मेरी नाव में।

विनोद कुमार दवे
पाली, राजस्थान
मोबाइल - 9166280718
ईमेल - davevinod14@gmail.com

चराग़-ए-दिल बुझाना मत

चराग़-ए-दिल बुझाना मत 
अभी तो रात बाकी है 
अभी तो राह भटके की 
बहुत सी बात बाकी है I
चराग़े-दिल बुझाना मत...
अभी यादों से लड़ना है 
अभी वादों में गलना है 
अभी कुछ देर ठहरो तो 
हमारी मात बाकी है I
चराग़े-दिल बुझाना मत...
सहर में शोखियाँ होंगी 
मग़र तन्हाईयों का क्या 
किसी बरबाद के हक़ में 
अभी सौगात बाकी है I 
चराग़े-दिल बुझाना मत...
सुकूँ के घर की बेटी थे 
कशमकश से हुआ रिश्ता 
दुल्हनिया सज के बैठी है 
अभी, बारात बाकी है I 
चराग़े-दिल बुझाना मत...
चराग़े-दिल बुझाना मत 
अभी तो रात बाकी है

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

ऐसी औलाद न दे

मेरे हिस्से में दुनिया का गम लिख दिया!!
नाम मेरे ही सारा सितम लिख दिया!!
जिसको पाला था मैंने बहुत प्यार से,
उसके हाथों ही मुझ पर जुलम लिख दिया!!
जो हर पल रुलायें ऐसे जज़्बात न दे!
कि मौत से बत्तर तू हालात न दे!!
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे!!
आँखों का कहती थी तारा तुझे!!
बुढ़ापे का कहती थी सहारा तुझे!!
पकड़ कर उँगलियाँ चलना सिखाया था जिनकी,
उन्ही हाथों ने  आज  मारा   मुझे!!
मर्जी है तेरी तू गम दे दे जितना!
जुलम दे दे जितना, सितम दे दे जितना!
पर बेटे की शक्ल में जल्लाद न दे!!
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे!!
गरीबी में अपनी संभाला तुझे!!
मोहताजी में भी है पाला तुझे!!
लगाकर के सीने से सुलाती थी जिसको,
उसी ने है घर से निकाला मुझे!!
कि जिन्दा उठा ले मुझे मेरे मौला,
फिर कोई माँ ऐसी फ़रियाद न दे!!
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे!!
बेबस हूँ, कितनी मै लाचार हूँ!
लगता है कि अब मैं गुनाहगार हूँ!! 
उजाड़े जो ममता की बगिया,
तू किसी को भी ऐसा सय्याद न दे!!
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे!! 
किसी को भी मौला ऐसी औलाद नदे!!
कलीम  'पालवी’
पाली – हरदोई

फिल्म समीक्षा- 'pk' (पी.के.)


 फ़िल्म ‘pk’ एक एलियन (दूसरे ग्रह का प्राणी) के द्वारा अपने घर (ग्रह) वापस लौटने के लिए किये गए संघर्ष की कथा है। ‘pk’ (फ़िल्म का पात्र) एक ऐसे ग्रह से पृथ्वी पर आया था जहाँ न तो कोई भाषा थी न ही वहां के लोग अपने शरीर को ढकने के लिए वस्त्रों का प्रयोग करते थे, उस ग्रह पर लोग आपस में संकेतों के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे अर्थात वहां की भाषा सांकेतिक थी। निर्देशक राजकुमार हिरानी जी ने pk पात्र के माध्यम से कुछ बुराइयों को उजागर किया है, जैसे pk जग्गू (अनुष्का शर्मा) से कहता है कि "हमरे गोले पर झूठ नाहीं बोलत हैं।" दुनियां में झूठ बोलना आम बात हो गयी है। इसी कारण जग्गू भी pk (आमिर खान) की दूसरे ग्रहवाली बातें सुनकर उसका यकीन नहीं करती है। अब जब pk को एलियन के रूप में दिखाना था तो उसके पास कोई न कोई शक्ति को भी दिखाना जाहिर सी बात थी जैसा कि अन्य फिल्मों में दिखाते हैं कि दूसरे ग्रह से आये प्राणी के पास कोई न कोई शक्ति ज़रूर होती है उसी प्रकार इस फ़िल्म में भी pk के पास एक ऐसी शक्ति है जिससे वह दूसरे मनुष्य के हाथ पकड़कर उसके मस्तिष्क में क्या चल रहा है यह पता आसानी से लगा लेता है यही नहीं एक वेश्या का हाथ पकड़कर पूरे 6 घंटे में वह उस वेश्या की पूरी भाषा अपने अंदर खींच लेता है। इत्तेफ़ाक़ से उस महिला की बोली भोजपूरी होती है। फ़िल्म में भोजपुरी का कमाल दर्शकों को खूब लुभाता है, पूरी फ़िल्म में आमिर खान भोजपुरी बोलते हुए दिखाई देते हैं।
        फ़िल्म की शुरुआत से ही निर्देशक ने पृथ्वी पर रहनेवाले लोगों की बुराइयाँ दिखाना शुरू कर दिया और ये पहली बुराई थी-चोरी। ‘pk’का पृथ्वी पर पहला क़दम रखते ही उसका वो संकेतक उसके गले से एक गाँव के व्यक्ति द्वारा छीनकर दिखाकर निर्देशक जी ने मनुष्य की पहली बुराई को उजागर कर दिया। उसके गले में पड़ा हुआ वो संकेतक जो उसके ग्रह में पृथ्वी पर उसके स्थान को संकेत करके बताता, तब उसका यान उसे वापस लेने के लिए पृथ्वी पर आता। संकेतक चोरी होने के बाद pk पूरी फ़िल्म में उसी संकेतक को ढूंढता हुआ नज़र आता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कोई पक्षी अपना बसेरा भूलकर इधर-उधर घूमता रहता है। पृथ्वी पर आकर pk को कैसी-कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इसको निर्देशक साहब ने बड़े ही मनोरंजक ढंग से ठीक उसी प्रकार दिखाया है जिस प्रकार जब बच्चा जन्म लेता है तो उसे पृथ्वी के बारे में कुछ नहीं पता होता है और जैसे-जैसे वो बड़ा होता रहता है अपने से बड़ों का अनुकरण करके वो सारी चीज़ें सीखता रहता है ठीक वही स्थिति थी pk की, जिसे पृथ्वी के बारे में कुछ नहीं पता था। दूसरे व्यक्तियों को देखकर उनका अनुकरण करके वह पृथ्वी पर मनुष्य की सारी चीज़ें सीखता रहता है। सभी लोगों से अपने संकेतक के बारे में पूंछने पर उसे नकारात्मक ही उत्तर मिलता है लोग उसे जो बता देते हैं वह वही करने लगता है। लोगों के द्वारा कहने पर "तुम्हारे लिए भगवान ही कुछ कर सकते हैं" यही वाक्य बार बार सुनकर वह भगवान को ढूंढने लगता है। अब बच्चा तो एक परिवार में जन्म लेता है और परिवार से ही वह भगवान के बारे में जानता है। यहाँ pk है जो पृथ्वी पर बड़ा होकर ही आया। भगवान से मिलने के लिए वह भगवान को ढूंढने के लिए पोस्टर भी छपवाता है जिसपर लिखा होता है, 'लापता' और नीचे होती है भगवान की तस्वीर। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के भगवानों से वह अपने उस संकेतक की मांग करता है जिससे वह अपने घर वापस जा सके, इसी प्रयास में वह सभी धर्मों के रीति-रिवाज़ों का अनुसरण करता है और भगवान से प्रार्थना है। ये सब करने के बाद भी उसका संकेतक उसके हाथ नहीं लगता है तो वह सोचता है कि शायद उसकी बात शायद भगवान तक नहीं पहुँच रही है।
        एक कार्यक्रम के दौरान pk अपना संकेतक तपस्वी बाबा के पास देखककर दौड़कर उसे पाने की कोशिश करता है लेकिन उसके संकेतक को भगवान शंकर के धमरू से टूटा हुआ मनका बताकर उसे सुरक्षा कर्मियों के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। ये सब जानकार जग्गू pk के द्वारा तपस्वी बाबा के ढोंगों का पर्दाफ़ास करने का विचार बनाती है। pk का साथ लेकर जग्गू ने आम नागरिकों को जागरूक किया, जिससे लोग तपस्वी बाबा के द्वारा बताई गयी गलत बातों का प्रतिकार करने लगे जो जग्गू और उसकी न्यूज़ रिपोर्टर टीम का मक़सद था उसमे उन्हें कामयाबी मिलने आसार लगने लगे। pk का साथ लेकर जग्गू की टीम ने अंत में ढोंगी तपस्वी बाबा का ढोंग का भरा घड़ा फोड़ दिया, जो वर्तमान में चल रही गतिविधियों पर भी कटाक्ष करता है। अंत में pk ने जग्गू को उस लड़के से भी मिलवाया जिससे वह और वो लड़का सरफ़राज़ बेइंतेहा मोहब्बत किया करते थे, लेकिन तपस्वी बाबा की भविष्यवाणी जग्गू के दिमाग में बैठ जाने के कारण जग्गू ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाती है, ये सस्पेंस निर्देशक द्वारा अंत में खोलने की वजह से दर्शकों में रोमांच पैदा हो गया और पिक्चर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है।
        कहानीकार और निर्देशक साहब दोनों ने इस फ़िल्म की रचना करके बेशक समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास किया है। अंत के दृश्य में यह भी दिखाया है कि pk जब अपने ग्रह को वापस लौट रहा होता है तो जग्गू से बिछड़ने के गम में उसकी आँखों में आंसू होते हैं आखिरकार pk का जग्गू से प्यार होना भी दिखाना था, नहीं तो मुख्य भूमिका में आमिर खान और अनुष्का अधूरे से जान पड़ते लेकिन शादी इसलिए नहीं कर सकते थे क्योंकि pk (आमिर खान) एक एलियन है और उसे घर वापस भी भेजना था। फ़िल्म के माध्यम से pk की पूरी टीम ने सभी धर्मों में व्याप्त अंधविश्वासों का खुलकर विरोध किया है, समाज में फैली हुई बुराइयों पर कटाक्ष किये है चोरी करना, झूठ बोलना, बेईमानी करना आदि को नकारात्मक रूप में अच्छी तरह प्रस्तुत किया गया है। फ़िल्म में गीतों की संख्या कम रखने से यह जाहिर होता है कि निर्देशक ने दर्शकों का ध्यान फ़िल्म की कहानी पर केंद्रित रखने का प्रयास किया है। फ़िल्म का हर दृश्य रोमांच पैदा करता है और हास्य-व्यंग्य शैली का अच्छा प्रयोग किया गया है।


आज़र ख़ान
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
ईo मेल-azar786khan@gmail.com
मोo-8791102723

बजरंगी भाईजान : फ़िल्म समीक्षा

यदि मनोरंजन के मसाले में मुद्दा मिला दिया जाता है। तो स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। मनोरंजन के साथ मुद्दे को मिलाकर  कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है। और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती।
‘बजरंगी भाईजान’बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं। सद्प्रभाव होता है तो ‘बजरंगी भाईजान’का स्पष्ट संदेश है कि दोनों देशों की जनता नेकदिल और मानवीय हैं।
पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी मध्यवर्गीय हिंदू परिवार में पला भोंदू किस्म का लड़का है। हां, उसकी खासियत है वह बजरंग बली का भक्त है और सच्चा एवं ईमानदार लड़का है। जो पढ़ाई से लेकर तो हर मामले में जीरो है। लगातार फेल होने वाला पवन जब पास हो जाता है तो उसके पिता सदमे से ही मर जाते हैं। बजरंगबली का वह भक्त है। बजरंग बली का मुखौटा लगाए कोई जा रहा हो तो उसमें भी पवन को भगवान नजर आते हैं।
उसके पिता कुछ कमाने के उद्देश्य से उसे दिल्ली जाने की सलाह देते हैं। दिल्ली पहुंचने पर पवन की मुलाकात रसिका से होती है। दोनों के बीच स्वाभाविक प्रेम होता है। इस बीच एक गूंगी बच्ची भी उसके जीवन में आ जाती है। भटकी लड़की को उसके मां-बाप से मिलाने की कोशिश में बजरंगी गहरे फंसता जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और पता चलता है कि बच्ची तो पाकिस्तान की है।
कई बार तर्क और कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। शायद लेखक-निर्देशक जल्दी से अपने ध्येय तक पहुंचना चाहते थे। वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरना चाहते हैं। जिसमें काफ़ी हद तक वे सफल भी हुए हैं। इसमें उनकी सहायता पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद करता है। फिल्म जब खत्म होती है तो सभी की आंखें नम होती हैं। गूंगी बच्ची जिसे पवन मुन्नी कहता है और जो अपने मां-बाप की शाहिदा है, उसकी अंतिम पुकार दर्शकों को हिला देती है।
‘बजरंगी भाईजान’हिंदी सिनेमा के इतिहास की उन चंद फिल्मों में से एक होगी, जिसमें पाकिस्तान को दुश्मन देश के तौर पर नहीं दिखाया गया है। देशभक्ति के नाम पर गालियां नहीं दी गई हैं। इसमें उन धारणाओं के प्रसंग हैं, जिनसे गलतफहमियां जाहिर होती हैं। दोनों देशों के शासकों और राजनीतिक शक्तियों ने इस वैमनस्य को बढ़ाया है। ‘बजरंगी भाईजान’मानवीय और सौहार्दपूर्ण तरीके से उन धारणाओं को छेड़ती है। गलतफहमियां दोनों तरफ से हैं। भारत में रहते हुए हम अपनी कमियों से परिचित होते हैं और पाकिस्तान पहुंचने पर वहां मौजूद गलतफमियों से रूबरू होते हैं। पवन की तरह ही भोंदू टीवी रिपोर्टर की इंसानियत जागती है। बजरंगी में भाईजान लफ्ज जुड़ता है और हम देखते हैं कि कैसे दिल पिघलते हैं। सरहद पर खिंची कंटीली तारों के बीच बने फाटक के दरवाजे खुलते हें। ‘बजरंगी भाईजान’दोनों देशों को करीब लाने का नेक प्रयास करती है।
कलाकारों में हर्षाली मल्होत्रा अपनी मासूमियत से दिल जीत लेती है। वह गूंगी है, लेकिन आंखें और चेहरे से प्रेम का इजहार करती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मौजूदगी फिल्म को आगे बढ़ाने के साथ रोचक भी बनाती है। वे दर्शकों को मोह लेते हैं। उनके किरदार और अभिनय में सादगी है। सलमान खान का किरदार इतना सरल और प्रभावशाली है कि वह दर्शकों को अपने साथ लिए चलता है।
बात खूबियों की करें तो फिल्म दूसरे भाग में काफी मजबूती से पर्दे पर आती हैं। दूसरे भाग में इंटरटेनमेंट भी ज़्यादा है और भावुक सीन्स भी। नवाज़ुद्दीन के आते ही फिल्म में इंटरटेनमेंट का तड़का लग जाता है।
सलमान अपने भोले-भाले किरदार में सफल दिखे। शाहिदा के किरदार में हर्षाली आपका दिल जीत लेंगी। धर्म और दोनों देशों की सोच पर भी बढ़िया तंज़ है। करीना का क़िरदार सादा और सहज है। फिल्म के गाने ठीक हैं पर 'सेल्फ़ी ले ले' और 'भर दे झोली' के अलावा कोई और गाना आपकी ज़ुबान पर शायद न टिके।
फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है और निर्देशन पर भी अच्छी पकड़ है। भारत-पाकिस्तान के खट्टे-मीठे रिश्तों ने हमेशा ही फिल्मकारों को आकर्षित किया है। गदर जैसी फिल्मों में खट्टापन ज्यादा था तो 'बजरंगी भाईजान' में इन पड़ोसी देशों के बारे में मिठास ज्यादा मिलती है। गदर में अपनी पत्नी को लेने के लिए सनी देओल पाकिस्तान में जा खड़े हुए और पूरी फौज को उन्होंने पछाड़ दिया था। बजरंगी भाईजान में पाकिस्तानी से आई बालिका को छोड़ने सलमान खान भारत से वहां जा पहुंचते हैं जहां उन्हें कई मददगार लोग मिलते हैं। उनके व्यवहार से महसूस होता है कि दोनों देश के आम इंसान अमन, चैन और शांति चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक स्तर पर दीवारें खड़ी कर दी गई हैं और कुछ लोग इस दीवार को ऊंची करने में लगे रहते हैं।
तो कुल मिलाकर सीधी,सरल फ़िल्म है 'बजरंगी भाईजान', जो आपको हंसाएगी भी, पर फ़िल्म में तर्क न ढूंढें तो बेहतर होगा । बजरंगी भाईजान को कमर्शियल फॉर्मेट में बनाया गया है और हर दर्शक वर्ग को खुश किया गया है। हिंदू-मुस्लिम, भारत-पाक, इमोशन, रोमांस, कॉमेडी बिलकुल सही मात्रा में हैं और यह फिल्म इस बात की मिसाल है कि कमर्शियल और मनोरंजक सिनेमा कैसा बनाया जाना चाहिए। दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर आता है तो उसे महसूस होता है कि उसका पैसा वसूल हो गया है।
विजयेन्द्र प्रसाद ने बेहतरीन कहानी लिखी है जिसमें सभी दर्शक वर्ग को खुश करने वाले सारे तत्व मौजूद हैं। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी उम्दा लिखा गया है और पहले दृश्य से ही फिल्म दर्शकों की नब्ज पकड़ लेती है। शुरुआती दृश्यों में ही मुन्नी अपनी मां से बिछड़ जाती है और दर्शकों की हमदर्दी मुन्नी के साथ हो जाती है, मुन्नी का राज खुलने वाले दृश्य जिसमें पता चलता है कि वह पाकिस्तान से है, बेहतरीन बन पड़ा है। वह पाकिस्तान की क्रिकेट में जीत पर खुशी मनाती है और बाकी लोग उसे देखते रह जाते हैं। इसी तरह मुन्नी का चुपचाप से पड़ोसी के घर जाकर चिकन खाना, मस्जिद जाना, उसको एक एजेंट द्वारा कोठे पर बेचने वाले सीन तालियों और सीटियों के हकदार हैं।
पाकिस्तान में पवन को पुलिस, फौज और सरकारी अधिकारी परेशान करते हैं, लेकिन आम लोग जैसे चांद (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और मौलाना (ओम पुरी) उसके लिए मददगार साबित होते हैं। एक बार फिर कुछ बेहतरीन दृश्य देखने को मिलते हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में भले हीे सिनेमा के नाम पर छूट ले ली गई हो, लेकिन यह इमोशन से भरपूर है। भारत-पाक दोनों ओर की जनता का पवन को पूरा समर्थन मिलता है और उसे एक सही मायने में हीरो की तरह पेश किया गया है। एक ऐसा हीरो जिसे आम दर्शक बार-बार रुपहले परदे पर देखना चाहता है। गूंगी मुन्नी की फिल्म के अंत में बोलने लगने लगती है, भले ही यह बात तार्किक रूप से सही नहीं लगे, लेकिन यह सिनेमा का जादू है कि देखते समय यह दृश्य बहुत अच्छा लगता है।
निर्देशक कबीर खान ने फिल्म को बेहद संतुलित रखा है। उन्हें पता है कि कई लोग इसे हिंदू या मुस्लिम के चश्मे से देखेंगे, लिहाजा उन्होंने कहानी को इस तरह से प्रस्तुत किया है कि किसी को भी आवाज उठाने का मौका नहीं मिले। उन्होंने फिल्म को उपदेशात्मक होने से बचाए रखा तर्क की बात की जाए तो कई प्रश्न ऐसे हैं जो दिमाग में उठते हैं। जैसे क्या बिना वीजा के लिए गैर-कानूनी तरीके से किसी देश में घुसना ठीक है? सीमा पार करते ही पवन को पाकिस्तानी फौजी पकड़ लेते हैं और फिर छोड़ देते हैं, क्यों? मुन्नी की मां अपनी बेटी को ढूंढने की कोशिश क्यों नहीं करती?
अव्वल तो ये कि फिल्म में इमोशन और मनोरंजन का बहाव इतना ज्यादा है कि आप इस तरह के सवालों को इग्नोर कर देते हैं। वहीं इशारों-इशारों में इनके जवाब भी मिलते हैं। पाकिस्तानी फौजी सोचते हैं कि इस आदमी की स्थिति ‍इतनी विकट है कि कानूनी रूप से वे चाहे तो कभी भी मदद नहीं कर सकते, लेकिन इंसानियत के नाते तो कर ही सकते हैं। धर्म और कानून से भी बढ़कर इंसानियत होती है। शायद इसीलिए अंत में पाकिस्तानी सैनिक, पवन को रोकते नहीं हैं और बॉर्डर पार कर भारत जाने देते हैं।
सलमान खान की मासूमियत जो पिछले कुछ वर्षों से खो गई थी वो इस फिल्म से लौट आई है। उन्होंने अपने किरदार को बिलकुल ठीक पकड़ा है और उसे ठीक से पेश किया है। वे एक ऐसे हीरो लगे हैं जिसके पास हर समस्या का हल है।
हर्षाली मल्होत्रा इस फिल्म की जान है। उसकी भोली मुस्कुराहट, मासूमियत, खूबसूरती कमाल की है। हर्षाली ने इतना अच्छा अभिनय किया है कि वह सभी पर भारी पड़ी है। उसके भोलेपन से एक पाकिस्तान का घोर विरोधी किरदार (जो कहता है कि यह उस देश की है जो हमारे लोगों को मारते हैं) भी प्रभावित हो जाता है। संगीत और संवाद के मामले में फिल्म कमजोर है। 'सेल्फी ले ले रे' खास नहीं है। चिकन सांग की फिल्म में जरूरत ही नहीं थी और यह गाना नहीं भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 'भर दो झोली' जरूर अच्छा है और 'तू जो मिला' का फिल्म में अच्छा उपयोग किया गया है।
'बजरंगी भाईजान' की सच्चाई और मुन्नी की मासूमियत दिल को छूती है। 'बजरंगी भाईजान' की शुरुआत कश्मीर की बर्फीली वादियों से होती है, वहीं 2 घंटे 43 मिनट बाद वह बर्फ आंखों की कोर में पिघलती महसूस होती है। बीते छह वर्षों में यह पहला मौका है, जब‍ सलमान की  फिल्मों ने मनोरंजन करने के साथ ही दर्शकों खासकर उनके फैंस को रूलाया है। यूं तो भावुकता का पाठ 'किक' में भी पढ़ाया गया था, लेकिन तब 'डेविल का हैंगओवर' ज्यादा था।
यह फिल्म 2009 के बाद से सलमान खान और उनकी फिल्मों को लेकर बने तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ती है। फिल्म की कहानी स्वीट और सिंपल है, जिसमें मारधाड़ और करिश्माई स्टंट्स की कोई गुंजाइश नहीं थी। यह अच्छा है कि न तो कबीर खान और न ही सलमान ने ऐसा कोई रिस्क ही उठाया। ऐसे में लंबे अरसे बाद अपने हीरो को एक संजीदा किरदार में देखकर अच्छा लगता है।  उससे भी अधि‍क खुशी तब होती है, जब अब तक सलमान के धुर विरोधी रहे आलोचक दबे हुए शब्दों में ही सही फिल्म की सफलता और इसमें सलमान की सराहना करते हैं।
शाहिदा/मुन्नी के किरदार में हर्षाली फिल्म की जान है। वह वाकई फिल्म की ट्रम्प कार्ड है। बिना कुछ बोले हुए भी हर फ्रेम में उसकी मासूमियत सब पर भारी पड़ती है। करीना के हिस्से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन वह भी सुंदर लगी हैं। फिल्म में हर पहर के लिए एक गीत है। सलमान की एंट्री से लेकर दरगाह पर इबादत और रास्तों की मशक्कत तक, हर समय कोई न कोई गीत चलता रहता है।...क्योंकि सबकुछ सिनेमा नहीं होता फिल्म में कुछ सीन ऐसे भी हैं जो गले नहीं उतरते मसलन, अंतिम सीन में लोगों द्वारा सीमा पर लटके ताले को तोड़ना और नैतिक बनकर अपनी-अपनी सीमा में ही खड़े रहना। पाकिस्तानी सेना का व्यावहारिक अंदाज से इतर आवाम और सरकार के सामने सरेंडर करना या फिर शुरुआती सीन में शाहिदा का ट्रेन से उतरना, लेकिन ऐन मौके पर ट्रेन की सुरक्षा में पहरा दे रहे घुड़सवार दल का गायब हो जाना।
खैर इतना चलता है क्योंकि सबकुछ असल जैसा हो तो वो सिनेमा कैसे कहलाएगा और फिर मनोरंजन भी एक बात होती है। लेकिन यह भी सच है कि जिंदगी सिनेमा नहीं। यह फिल्म  पाकिस्तान में भी रिलीज हुई है। सरहद से लेकर सियासत तक पाकिस्तान की सेना और सरकार से कोई उम्मीद पालना अब बेमानी सा हो गया है, ऐसे में उम्मीद यह है कि कम से कम सरहद पार हमारे भाइयों को भी 'बजरंगी भाईजान' भावनात्मक डोर में बांधेगी और वो भी शाहिदा, पवन कुमार चतुर्वेदी और चांद मुहम्मद के बहाने पल रहे सियासी तानाबाना से इत्तफाक रखेंगे क्योंकि दोनों मुल्कों के रिश्तों में कभी तो सुबह आएगी...
भाईजान में हम एक अलग ही सलमान खान को देखते हैं जिन्हें इससे पहले हमने स्क्रीन पर नहीं देखा है। यहां उनकी चाल में वो अकड़ नहीं है, न उनकी सिग्नेचर पंचलाइन हैं और न ही वो एक बार भी अपनी शर्ट फाड़ते हैं। अपनी लार्जर देन लाइफ एक्शन हीरो की छवि को अलविदा कहते हुए इस सरहद पार कहानी में सलमान खान शांति और अमन कि छवि पेश करते हैं। जिसका नतीजा ये है कि पिछले कुछ साल में ये सलमान खान की शायद सबसे तार्किक फिल्म है।

तेजस पुनिया
स्नातकोत्तर, हिंदी विभाग
भाषा एवं मानविकी अध्ययन केंद्र
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय
+918802707162

हे मानव!


किससे करे चालाकी रे मन
सब तो नजर में उसके है,
तू सोचे तेरे पैसों पर मोहित,
फिर तो बिलकुल भोला है।
बोया बाजरा न उगेगा गेहूँ,
ये भी काहे भूल रहा।
कर्म किया वो ही भोगेगा,
चढ़ा चढ़ावा कितना भी।
चाह रहा भगवान खरीदना,
इतना दर्प है दौलत पर।
दौलत उसका दिया हुआ है,
फिर तेरा कैसे  है भोले।
सब धरती पर ही रह जाना,
जाना एक न धेला रे।
फिर काहे का लगा झमेला,
काहे पर तू इतना इतराये है।
बिना बात हत्या कर देता,
चोरी डाका की न पूछो रे।
भाई भाई को भी न छोड़े,
सबसे प्यारी दौलत है।
बेटा बाप पर दागे गोली,
बाप से प्यारा पैसा है।
अन्तिम बेला आई तब साथी,
गया न एक भी रत्ती रे।
साथ जायेगा कर्म ही तेरा,
बस उसका कर ले सुधार तू।
बोयेगा बस वोही पायेगा,
काम न आयेगा चढ़ावा रे।
रे मन अब भी अवसर है तुझपे,
कर कुछ सच्चा काम तू।
देवी पूजन करता है तू मानव,
जिन्दा देवी का तो कर मान रे।
मन्दिर घूम के आया है तो,
घर भी मन्दिर मान ले।
बेटी,बहन, माँ और पत्नी का,
कर पहले सम्मान तू।
घर जैसी ही  बाहर की नारी,
सबका कर पूरा मान रे।
माने तुझको दौलत वाला तब,
भूखे बेघर को एक ठिकाना दे।
सच्चा दौलत वाला तुझको माने,
सब नारी का हो सम्मान रे।
उन बच्चों को उनका बचपन दे,
जो मजदूरी को हैं मजबूर रे।
किससे करे चालाकी रे मन,
सब तो नजर में उसके है।

 डॉ. सरला सिंह
टी.जी.टी.(हिन्दी)
स्थान- दिल्ली

सेलिब्रिटी


वे समझते हैं
खुद को सेलिब्रिटी 
बड़े हो गए 
तो आप जरा अदब से मिलें 
करें दुआ- सलाम रोजाना 
देखें उनकी ओर 
कृपादृष्टि बरसने की उम्मीद लिए 

एक पल को तो लगेंगे ये
बेहद अहंकारी, कुंठित 
पर लेना जायजा कभी  
इनके आसपास की भीड़ का
पाओगे कुछ को
रोज मजमा लगाने वाले
मदारी की तरह 
और कुछ की हालत से 
पसीजेगा ह्रदय  
जब देखोगे इन्हें 
किसी और के आगे-पीछे 
हाथ बाँधे खड़े हुए 
 
बोरिंग पासिंग गेम की तरह
बड़े-छोटे समझने का यह भ्रम 
सृष्टि में सदियों से है जारी 
आगे भी रहेगा
भटकती सभ्यता और
आखिरी मानव की 
आखिरी साँसों के
बीत जाने तक

अब ये तुम पर है
कि ज़िंदगी की शतरंज में
स्वयं को कहाँ खड़ा 
करना चाहोगे 
बस डूबते सूरज को
ध्यान में रखना!

प्रीति 'अज्ञात'
संस्थापक एवं संपादक - 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, सामाजिक कार्यकर्ता

सिर्फ इतना ही

सिर्फ इतना ही

बदला है समय 
अब 'बात' होना
गुणवत्ता की निशानी नहीं 
निकृष्ट और सर्वोत्तम के बीच   
महज उम्दा प्रचार- प्रसार का
नाजुक फ़ासिला है 
पाले हुए भ्रम का
अनायास जीवित हो जाना
और जीवंतता की मृत्यु
अत्यन्त सहज है इन दिनों 

कहीं बड़ा-छोटा, ऊंच-नीच,
पद-पैसा देख हो रहा तय
बुद्धिमत्ता का स्तर
तो कहीं स्वार्थी गुटों में
पूर्व-निर्धारित हैं विजेता
इधर कलई खोलने वाला मूरख
असाध्य रोगी-सा खीजता, तिलमिलाता 
और सरकारी फाइलों में कसमसाते
किसी गम्भीर मुद्दे की तरह
सिसककर बीच राह ही दम तोड़ देता है

हम किसी के लिए पूजनीय हैं
और किसी के लिए कीड़े-मकोड़े
अब तय हमें करना है....
सिर्फ इतना ही.... 
कि स्वयं को दर्पण में देख
बग़ैर शर्मिंदगी के 
मुस्कुरा पाते हैं भी या नहीं!

प्रीति 'अज्ञात'
संस्थापक एवं संपादक - 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, सामाजिक कार्यकर्ता

साहित्यकार का मर्म

साहित्यकार का मर्म

मुंशी जी ने कहा तुम्हें तो हिन्दी नहीं आती
धीरे-धीरे आ जाएगी
प्रेमचंद ने विनम्रता से कहा
वो उर्दू माध्यम से नाम कर चुके थे
वो बड़े कलाकार हो चुके थे।
प्रबुद्ध जनों ने परंपरा डाली है
भर्तियाँ करने की
जाति और धर्म के नाम पर
योग्यता तो आ ही जाएगी-
इस विश्वास के साथ।
जिस जाति और धर्म का संस्थान
उसी वर्ग के सदस्य
बड़ा कवि, कहानीकार बनना है
तो पहले आलोचक तैयार करो
संपादक बनाओ
सुंदर बनो, अश्लीलता, फूहड़ता
नये कलेवर में पेश करो,
वो बाजार में तुम्हें उतार देंगे
फिर बिकना तुम्हारी खूबी पर
तुम्हारे सौदे पर निर्भर करेगा
साथ ही तुम्हारी बिरादरी की
जनसंख्या और सजगता पर।
फिर भी नाम तो होगा ही
यही क्या कम है।
समाज का देव वर्ग
अपने कर्मों- कुकर्मों से
सुविधा भोगते रहे, ऐश करते रहे
उनकी इस व्यवस्था में खलल पड़ी तो
तड़फड़ा उठे,
उन्हें दूसरे की व्यवस्था में खामी दिखी
अपनी उस व्यवस्था में
उन्हें दरार दिखाई देने लगी
जो उन्होंने भाई-भतीजा,
परिवार, जाति, उत्कृष्टता
और दैवत्व के कारण भरी थी।
तब योग्यता कहाँ थी
आज के पिछड़े तबके ने
जब यही कार्य किया-तो
उन्हें अपने समाज पर,
संकट दिखा।
सदियों से बगैर मेहनत के
मक्खन खाने पर,
कुहासा दिखा।
नाम होना चाहिए- चाहे गलत कर्म से।
या फिर अच्छे कर्म से।
बाजार में माल बनाये जाते हैं जैसे
वैसे ही साहित्यकार
बनाये जाते हैं- यह परंपरा है, सृष्टि की।
प्रायः बड़ा साहित्यकार- कवि, कहानीकार
मुफलिसी में जीवन जीता है
उसका नाम और सम्मान
उसके मरने के बाद होता है।
यह इतिहास रहा है।
फिर उसके नाम पर पुरस्कार दिया जाता है
भले ही उसे किसी पुरस्कारं के काबिल
उसके जीते जी में न समझा गया हो-
कबीर, मार्क्स, मुक्तिबोध, निराला।
आलोचक और सम्पादक
खुद के कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार गढ़ते हैं
हैं, घोषित करते हैं, बनाते हैं
अमुक कवि के फला आलोचक
और उनके प्रिय संपादकगण
धन दीजिए, जन लीजिए
पुस्तकें छप जाएँगी
जिसे चाहा उसे उठा दिया
और जिसे चाहा उसे गिरा दिया।
पूरे शिद्दत से गुणगान किया
सोहर गाया
पूरी लगन से मट्टी पलीद किया।
क्योंकि संस्थान से जुड़ा नहीं या वो
मौका मिला- नौकरी दिला दिया
बन गये प्रोफेसर।
शर्त हो कि वो शख्स की पहले जाति मिलती रहे
फिर तो यह जुमला तैयार ही है
कि योग्य तो रहा होगा
तभी उसे नौकरी मिली
भले ही न्यूनतम योग्यता ही सही।
रही-सही कसर उसकी विशाल जाति पूरी कर देगी।
फिर दो चार रचनाओं से
रचनाकार बना दिया जाएगा।
बशर्ते चाटुकारिता में अव्वल हो
योग्यता तो धीरे-धीरे ही आ जाएगी।
और न भी आ पाई
तो कोई क्या कर लेगा
धीरे-धीरे सब भूल जाएँगा
दो-चार दिनों बाद।
बाहर बैठा रचनाकार, अभ्यर्थी
यह मान लेगा कि मैं अयोग्य था,
नसीब नहीं था,
मैं इसमे हो सकता है
और बड़ा साहित्यकार।
किंतु जब वह बनता है
उसका नाम होता हे
तब तक तो वह मर चुका होता है
खुद से, समाज से, परिवार से,
लोग गालियाँ देते हैं, हसीं उड़ाते हैं।
उसकी असफलताओं पर।

विश्व दीपक 
शोधार्थी, हिंदी विभाग 
इलाहबाद विश्वविद्यालय 

साहित्य

दिखाता है सही चेहरा 
मीडिया 
तो बिक चुका है 
अर्थ का साम्राज्य है 
भ्रष्टाचार का मानसून आया 
आदर्श 
केवल गड़गडा रहे हैं 
अन्याय की वृष्टि हुई 
चहुँ ओर कीचड़ हो गया है 
लीपा-पोती चल रही है 
दशहरे की 
ध्वस्त होगा इस बार 
अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार 
का रावण 
या अट्टहास करेगा ? 
मानवता के ऊपर हावी 
दावनता पर ।
छोटे-छोटे व नवोदित 
जो सताए हुए हैं 
अन्याय-अत्याचार से 
साहित्य का शीशा लिए 
निहार रहे हैं छवियाँ । 
साहित्य तो दर्पण है 
सच्चाई बयां करेगा । 
जो विज्ञापन की इस आँधी में 
उड़ रहा है 
व्हाट्स ऐप व फेशबुक पर 
ट्विटर मनु की नाव बनकर 
ठेकेदारों को ढो रही है । 
ये नाव क्या लेगी बचा ? 
जब आएगा झोंका बड़ा 
साहित्य का ? 
होंगे सभी जलमग्न इसमें । 
जो सँवारेगा चरित्र 
और दायित्वों का सुचित्र 
न झुकेगा 
न रुकेगा 
अन्याय की इस बरसात में 
वही केवल बचेगा । 
इतिहास वह ही रचेगा ।।

राज वीर सिंह 
तरौंदा कानपुर देहात 

सावन


"शाम को ही लौटूँगा, खाना मत बनाना दोपहर का मेरा।"

    कहते हुए सुदर्शन ने छाता उठाया और निकल गया। बाहर सावन पूरे जोरोंपर था। मनोरमा ने चुपचाप एक नजर उसकी ओर डाली फिर चेहरा घुमा लिया। कितना बदल चुका था उसका पति। जबतक ससुर जी जीवित थे, सबकुछ ठीक चल रहा था। वे सारी खेती-बाड़ी अपने कंधेपर उठाये घर से बाहर तक के सारे काम हँसते हुए ऐसे कर जाते थे मानों कुछ मेहनत ही नहीं लग रही हो। अपने एकलौते बेटे से इतना मोह कि कभी कोई अपेक्षा नहीं की उससे। चालीस का होने को था, एक बारह साल की बेटी का बाप और किसी का पति लेकिन आदत वही सोलहवाली। लापरवाह, आवारा, सारा दिन इधर से उधर मटरगश्ती। वह अक्सर समझाने की कोशिश करती कि बाबूजी का हाथ बँटाओ, थोड़ा सहयोग दो घर में पर सुनता कौन था? हरबार का एक रटा-रटाया जवाब, अरे मेरी लाजो, तू क्यों चिन्ता करती रहती है? बाबूजी सब बहुत अच्छे से देख ही तो लेते हैं, मेरी क्या जरूरत? वे जिसदिन कुछ कहेंगे तो क्या मैं नहीं करूँगा? अंततः दो साल पहले बाबूजी परिवार की जिम्मेदारियों का कलश उठाये-उठाये ही सो गये। बस तभी से जैसे ग्रहण लग गया घर को। धीरे-धीरे करके सारा पाँच बीघा खेत सुदर्शन ने औने-पौने दामों में बेच डाला। घर के एक हिस्से को किरायेपर लगाकर जैसे-तैसे खर्च चल रहा। तनाव का नाम लगाके अब तो कभी-कभी पीने भी लगा। बीवी की नहीं तो कम से कम अपनी माँ की ही सुने, लेकिन नसीब में दुख हों तो बुद्धि भी बौरा जाती है। इन्हीं ख्यालों में डूबी मनोरमा के चेहरेपर अचानक हवा के तेज झोंके ने खुले आँगन से बरसती बूँदों को ला पटका। उसका ध्यान रिमझिम बरसात की ओर चला गया। उसकी पायल के घुँघरू भी तो ऐसे ही बजते थे न! छन-छन, रुन-झुन! बहुत बुरा है सुदर्शन, पिछले महीने उनको भी छीन के ले गया बेचने के लिए। किसी दिन मुझे भी ऐसे ही....." सोचते-सोचते उसकी आँखें भी सावन जैसी होने लगीं कि तभी सास राधा ने बुलाया।
"बहू, सुनना जरा।"
जल्दी से बहते आँसू पोंछे और सास के कमरे की ओर दौड़ी। आखिर अब वह ही तो थी जिससे अपना दुख बाँट लेती थी।

"हाँ अम्मा बोलो" मुस्कुराहट ओढ़ने की कोशिश करते हुए बोली।

"ले, जरा पैसे बचा रही थी कुछ दिनों से, सुनीता की स्कूल फीस के लिए, पाँच सौ हैं।"

    बिना कुछ बोले मनोरमा ने ले लिया। जानती थी कि कहाँ से बचाए होंगे। अपनी दवा लाने के नामपर किरायेदार से माँगा होगा और यहाँ दे दिया। भरे मन से उठकर चौके में चली गयी। सुनीता सुबह ही माँग रही थी फीस जमा कराने के लिए। दोपहर को लौटेगी तो दे दूँगी, सोचते हुए उसने बर्तन साफ करने शुरू किये। तभी दरवाजेपर किसी ने कुंडी बजाई। दरवाजा खोला तो पटवारी सुंदरलाल खड़ा था। हुँह, अब क्यों आया है? सुदर्शन को ऊल्टा-सीधा सिखा-पढ़ाके सारे खेत बिकवा दिये, अब क्या खून पियेगा? मनोरमा का मन उसको देखते ही जल उठा।


"अरे बहू, सुदर्शन कहाँ है?" सुंदरलाल ने अपनी खिचड़ी दाढ़ी-मूँछोंपर हाथ फेरते हुए पूछा।


"वे बाहर कहीं गये हैं, देर से लौटेंगे" मनोरमा ने अनमनाहट से कहा। वह चाहती थी कि सुंदरलाल जल्द से जल्द चला जाए।


"अच्छा ठीक है, कह देना कि एक बढ़िया पार्टी मिली है। पिछले दिनों उनको ये घर बाहर से दिखाया था तो वे बहुत खुश हुए। बोल रहे हैं कि मालिक से बात कराओ, बाकी उनसे ही समझ लेंगे।"

    क्या? अब ये घर भी बिक जाएगा? बहु बनकर वह जिस घर में उतरी, जिसके एक-एक कोने को उसने अपने बच्चे की तरह सँवार के रखा वह घर किसी और का हो जाएगा? मनोरमा का दिमाग ही मानों शून्य सा हो गया और कानों में तेज सनसनाहट होने लगी। वह चीख पड़ी।

"कुछ नहीं बिकेगा अब मेरा, जाओ यहाँ से।"

    सुंदरलाल के अवाक चेहरेपर ही उसने भड़ाम से दरवाजा बंद किया और रोती हुई अंदर दौड़ पड़ी। कमरे में जाकर बिस्तर पर गिरते-गिरते उसका रोना बहुत तेज हो गया। राधा घबरा के भागी-भागी आयी।

"अरे क्या हुआ री? कौन था?

    लेकिन मनोरमा को होश कहाँ? वह एक सुर से रोये जा रही थी। राधा हैरान-परेशान उसको चुप कराने के असफल प्रयासों में लगी रही। तबतक सुनीता ने दरवाजेपर आवाज दी। राधा ने दरवाजा खोला।

"अरे समझा अपनी माँ को, देख जाने क्यों तब से रोये जा रही।"

"माँ क्या हुआ?" सुनीता भी अपनी माँ को इस हाल में देखकर रुँआसी हो गयी।

    लेकिन मनोरमा ने कुछ नहीं कहा। उसका रोना अब सिसकियों में बदल चुका था। वह उठी और खाना बनाने लगी। सबको खिलाने के बाद उसी तरह खामोशी ओढ़े वह अपने कमरे में वापस आकर बैठ गयी। उसका मन बहुत भारी था। सास और बेटी के लाख कहने पर भी उसने कुछ नहीं खाया और वहीं बैठ दीवार को ताकती रही। सुदर्शन का क्या? वह तो आदतन ही सबकी बातों में आ जानेवाला है। अपनी कोई अक्ल नहीं। पटवारी एकबार फिर कुछ-कुछ बोल के भरमाएगा और वह हमेशा की तरह उसके जाल में फँस जाएगा। यही सोच-सोचकर उसको बार-बार रोना आ रहा था। दुखते सिर ने कब नींद से पनाह माँग ली, कुछ पता ही नहीं चला। सपने में वह एक सुंदर बाग में खड़ी थी। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल, तितलियाँ, ठंढी हवा के झोंके, तभी कहीं से उसे अपने उन्हीं घुँघरूवाले पायलों की छनकार सुनाई दी। उसने चारों ओर देखा, कहीं कुछ नहीं था। तभी वही छनकार और तेज उसके कानों में पड़ी और उसकी नींद खुल गयी। सामने सुदर्शन हाथों में उसके वही पायल लिए खड़ा था। वह चौंक गयी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। ये भी सपना है या हकीकत? उसने पलटकर देखा। राधा और सुनीता भी वहीं पास खड़ी मुस्कुरा रहीं थीं। वह झटके से उठकर बैठ गयी और सुदर्शन के हाथों से लपक के अपने पायल ले लिए और उनको निहारने लगी।

"ये कहाँ से लाए?" हैरत से पूछा।

    सुदर्शन का मुस्कुराता चेहरा अब संजीदा हो उठा।

"तुमलोगों का ख्याल नहीं रख रहा था न सो बाबूजी रोज मेरे अंदर से मुझको डाँटने लगे थे अब। पिछले महीने तो हद कर दी उन्होंने। कह दिया कि तेरे अंदर से भी चला जाऊँगा अगर तू नहीं सुधरा तो लेकिन मैं करता भी तो क्या? खींच-खाँच के बारहवीं तक पढ़ा हूँ और उम्र भी गुजर चुकी नौकरी पाने की। एक बीमा कंपनी का विज्ञापन देखा एकदिन अखबार में। पिछले महीने तुम्हारे पायल ले गया था न माँगकर? क्योंकि पास में बिल्कुल भी पैसे नहीं थे। सुनार के यहाँ जाकर भी जब उनको बेचने की हिम्मत नहीं जुटी तो बस गिरवीभर रखकर उससे मिले रुपयों से उस बीमा कंपनी के एजेंट के लिए आवेदन किया। बाकी थोड़े पैसे उसी की ट्रेनिंग और परीक्षा आदि में लग गये। घर में किसी को कुछ बताया नहीं क्योंकि अपनेआप से ही भरोसा उठ सा गया था। जाने सफलता मिलती या नहीं। अभी पिछले हफ्ते एजेंसी से लाइसेंस मिला। सारा दिन आवारागर्दी करता हूँ न! बहुत से लोगों से इसी आदत के कारण परिचय है। उन्हीं में से एक ने अपना बीमा मेरे माध्यम से कराया। थोड़े खाते-पीत आदमी हैं, पूरे पच्चीस लाख का कराया उन्होंने। मेरा कमीशन बीमा कंपनी ने नब्बे हजार रुपये तय किया जिसका चेक बहुत जल्द मिल जाएगा और कल दस हजार रुपये कंपनी के एक अफसर ने मुझे पहलीबार में ही इतना बड़ा बीमा कराने के कारण इनाम में दिए अपनी ओर से। उनसे आज तुम्हारे ये पायल छुड़ाकर ले आया। कुछ और लोगों से भी बात हुई है। पूरी उम्मीद है कि अगले हफ्तेतक वे भी मुझसे बीमा ले लेंगे। आज के बाद तुममें से किसी को कोई कमी नहीं होने दूँगा।"

    सुदर्शन एक साँस में सब बोल गया और मनोरमा आश्चर्यमिश्रित मुस्कुराहट के साथ सब सुनती रही। उसको अपने कानोंपर विश्वास नहीं हो रहा था। सुनीता ताली बजाती हुई अपने पापा से लिपट गयी।

"मेरे पापा सबसे अच्छे हैं।"

सुदर्शन ने भी उसे गले से लगा लिया।

"नहीं बेटा, तुम्हारी माँ और दादी सबसे अच्छी हैं, तुम जिन्दगी में उनके जैसी ही बनना।"

सावन अब सबकी आँखों में था।

कुमार गौरव अजीतेन्दु
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शाहपुर (ठाकुरबाड़ी मोड़ के पास), दाउदपुर (पोस्ट)
दानापुर (कैंट), पटना - 801503 बिहार