उपभोक्तावादी संस्कृति को ढोती महिलाएं - डॉ नमिता सिंह

उपभोक्तावादी संस्कृति को ढोती महिलाएं-डॉ. नमिता सिंह
आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में जनवादी लेखक संघ, प्रगतिवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के संयुक्त तत्त्वाधान में मार्क्सवादी चिंतक, विदुषी स्त्री लेखन में अग्रणीय भूमिका निभाने वाली डॉ. नमिता सिंह जी की पुस्तक "स्त्री-प्रश्न" का विमोचन किया गया जिसकी अध्यक्षता समाजसेवी प्रोफेसर ज़किया अतहर सिद्दीकी और हिंदी विभाग के हरदिल अजीज़ अध्यक्ष प्रोफेसर अब्दुल अलीम सर ने की जिन्होंने स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया है उन्होंने अपने अनुभवों को भी बांटा कार्यक्रम में पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत की गयी सर्वप्रथम डॉ. जया प्रियदर्शिनी शुक्ल ने पुस्तक की उपयोगिता पर बोलते हुए 'स्त्री-प्रश्न' जैसे मुद्दे पर बात की और स्त्री के बारे में गहराई से बताया कि किस प्रकार  अनेक विद्वानों ने बताया था कि 21 वी सदी महिलाओ की सदी होगी लेकिन आज स्त्रियों की दयनीय स्थिति को देखते हुए वो एक तरह से उपभोग की वस्तु बन चुकी है जिसको जैसी आवश्यकता होती है वो उसको वैसे इस्तेमाल करता है और छोड़ देता है जो समाज के लिए एक कलंक है। इसमें कोई संदेह नही है कि प्रगतिशील मानसिकता ने स्त्री की प्रतिष्ठा को तो बढ़ाया है लेकिन देखने मे आया है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है क्योंकि इसके गर्भ में दो मानसिकताओं, विचारधाराओं का टकराव है जिसकी वजह पूंजीवादी और सामंतवादी सोच है जिसने स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाने में अहम भूमिका निभाई है जबकि पहले मातृसत्तात्मक समाज था लेकिन अब पितृसत्तात्मक समाज का बोलबाला है जिससे ना ही स्त्री स्वास्थ्य, कुपोषण, यौन हिंसा और ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे पर कोई कुछ बोल पाता है ना ही उसको पूर्णतया न्याय मिलता है उसका सबसे बड़ा कारण स्त्रियों की राजनीति में बराबर की भागीदारी का ना होना भी है, समाज मे आज भी स्त्री को मासिक धर्म आने के समय उसको रसोई घर और घर मे बने मन्दिर में भी घुसने नही दिया जाता है जोकि संविधान में बराबरी के कानून की धज्जियां उड़ा रहा है, आजकल मध्यमवर्गीय परिवारों में लड़कियों को केवल स्टेटस मेन्टेन करने के लिए उनको थोड़ा बहुत शिक्षित किया जा रहा है जिससे उसकी शादी किसी अच्छे पढ़े लिखे लड़के से हो जाये और ससुराल में उसको ग्रहण कर लिया जाए।
इसी सिलसिले में हिंदी विभाग के अजय बिसरिया सर ने पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न' पर विचार रखते हुए उपभोक्तावादी समाज मे किस प्रकार स्त्रियों का दोहन हो रहा है उस संदर्भ में विस्तार से समझाया कि आज किस प्रकार धनी लोगो ने पूंजीवादी व्यवस्था के चलते हुए विज्ञापन में बाजारवादी संस्कारो ने स्त्री का प्रयोग किया है, स्त्रियों पर संस्कृति के नाम पर धर्म को थोपा जा रहा है क्योंकि पूंजीवादी,सामंतवादी,उपभोक्तावादी समाज की यह पहली पसंद भी है, इन सबसे बचने के लिए अब आने वाली नई पीढ़ी को अन्तररजातीय, अंतर्धार्मिक विवाह करने होंगे जिससे स्त्रियों को अपनी पसंद से वर चुनने की पूरी छूट होगी और समाज मे निश्चित ही बदलाव आएंगे और संविधान भी इसकी इजाजत देता है अगर ऐसा होता है तो हम कह सकते है कि बंधे कदमो से ही लम्बी छलांग लगाई है।
उसके बाद डॉ. नामिता सिंह जी ने स्वयं की पुस्तक पर ज्यादा ना बोलते हुए चन्द बातो में भी बात खत्म कर दी उन्होंने कहा मानव समाज का विकास स्त्री पराधीनता का भी विकास है जिस प्रकार मानव ने विकास क्या है ठीक उसी प्रकार स्त्री पराधीनता ने भी अपने पांव पसारे है तथा वर्तमान में बनारस हिन्दू विश्वविद्यायल का मामला हमारे सामने है कि किस प्रकार से पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्रियों से पढ़ने, लिखने, घूमने तक की आजादी को छिनने का षड्यंत्र रचा है और वो हमेशा औरतो को अपना ग़ुलाम बनाना चाहते है
कार्यक्रम में हिंदी विभाग अध्यक्ष हरदिल अजीज़ प्रोफेसर अब्दुल अलीम, प्रोफ़ेसर प्रदीप सक्सेना, प्रोफेसर आशिक़ अली, प्रोफेसर तसनीम सुहैल,प्रोफेसर रेशमा बेगम, प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ तिवारी, प्रोफेसर कमलानंद झा, प्रोफ़ेसर समी रफ़ीक़, डॉ. जावेद आलम, डॉ. शाहवाज़ अली खान, डॉ. गुलाम फरीद साबरी, डॉ. राहिला रईस, नीलोफर उस्मानी के अलावा अनेक शहर के गणमान्य लोग मौजूद थे अंत मे प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी सर ने धन्यवाद ज्ञापन किया,
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. दीपशिखा सिंह जी ने किया ......
प्रस्तुति
अकरम हुसैन क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

मेरे लेखन के स्वर्णिम क्षण

अवसर न मिलने की शिकायत अवसरवादी लोग करते हैं। मुझे कदम कदम पर अवसर मिले, बांहें फैलाए। मुझे धीरे धीरे यह भी पता चला कि किसी भी लेखक की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा किन्हीं विशेष अवसरों पर उरूज पर होती है। ये अवसर हैं नए साल की शुभकामनाएं, होली दीवाली ईद बैसाखी आदि त्योहारों की बधाई, मुंडन कनछेदन शादी आदि संस्कारों के निमंत्रण पत्र, शोक संदेश, प्रेम पत्र आदि।इन मौकों पर अनेक लेखकों ने शब्द की सार्थकता मार्मिकता प्रमाणित की है। यह बात मैं अनुभव से कह सकता हूं।मैं स्वयं इस लेखन से जुड़कर वर्षों तक मां भारती का भंडार भरता रहा। ऐसे जनोन्मुख लेखन में मेरा भी कालजयी योगदान है। वैसे तो मेरे लेखन के अनेक स्वर्णिम क्षण हैं। लेकिन मैं केवल दो तीन आयामों तक इसे सीमित रखू़ंगा। अगर कोई मेरे इस लेखन पर शोध करना चाहे तो शीर्षक होगा--विदा से अंतिम विदा तक।
दरस्ल, ऐसे जनोन्मुख लेखन से जुड़े लोग मूक सेवक होते हैं। अपना नाम नहीं चाहते। एक तरह के लोक साहित्यकार। किसी समय निमंत्रण पत्रों में राष्ट्रीय महत्व प्राप्त इन पंक्तियों का लेखक कौन है, आज कोई नहीं बता सकता--'भेज रहा हूं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को, हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को। 'कोई इन्हें सामान्य पंक्तियां समझने की भूल न करे। एक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने तो बाकायदा इसपर सेमिनार कराया था।कि 'हे मानस के राजहंस 'होगा या 'हो मानस के राजहंस' होगा। पूरे दिन की उच्चस्तरीय बहस के बाद तीन प्रोफेसरों वाली बेंच ने स्पष्ट निर्णय सुनाया था। उनके अनुसार इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं है। दोनों हो सकते हैं। बहस करते हुए एक अध्यापक ने अद्भुत शोध किया था कि यह श्रेष्ठ कविता संभवतःतुलसीदास की है। रामचरितमानस और मानस में साम्य है। इतने बड़े कवि के लिए कुछ भी कर गुजरना असंभव नहीं। किसी ने उनकी कविता का खड़ी बोली में अनुवाद कर दिया है। उस बहस के बाद निमंत्रण पत्रों में विकसित हिंदी कविता के प्रति मेरा आदर बढ़ गया था।
इस बात को लेकर आप अधिकांश हिंदी अध्यापकों के प्रति सुख संतप्त महानुभूति से खुद को भर सकते हैं कि उनके होने मात्र से मुहल्ले या कॉलोनी में भाषा और साहित्य का स्तर कहां से कहां पहुँच जाता है। उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि शादी ब्याह वग़ैरह के मौके पर लीक से हटकर कार्ड का मैटर बना दें।कल्पना करना कठिन ही होगा कि लीक के भीतर घुस कर होनेवाली शादियों के कार्ड लीक से हटकर बनते हैं। वाह।
वैसे यह बहुत आनंदपूर्ण काम है।मनोरंजन शब्द ने आनंद को भगा दिया है इसलिए यह मनोरंजक काम है। कुछ गैर ज़िम्मेदार अध्यापकों को छोड़कर बहुतेरे ऐसे जनोपयोगी साहित्य की रचना और इसी स्तर की अध्यापन पद्धति से शिक्षा का ललाट सपाट कर रहे हैं। फिर भी, इस क्षेत्र में होने वाले नूतन प्रयोगों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। जैसे 'मेले मामा की छादी है। जलूल जलूल आना'--एक ऐसा ही विचारोत्तेजक प्रयोग है। विदाई के लिए 'भीगी पलकें' या 'तारों की छांव में' का इस्तेमाल भी चर्चित रहा है। एक बार विदाई के लिए 'पालगोमरा की पालकी' का भी इस्तेमाल एक जादुई अध्यापक ने किया था। इस प्रयोग का जर्मन भाषा में अनुवाद भी हुआ।
ऐसे ही मौलिक प्रयोग करने वाले एक गुरुदेव के संरक्षण में मुझे इस महान लेखन का गुरुमंत्र मिला था।यह शिक्षा आगे बहुत काम आई। गुरुदेव 'वियोगी होगा पहला कवि' से 'वियोगी होगा पहला कार्डकार' तक आ चुके थे। यह शब्द साहित्यकार के वजन पर है। वैसे कुछ लोग अपने लेखन में भी कार्डमैटर ही लिख रहे हैं। तो किस्सा यह कि गुरुदेव एक लड़की से बेपनाह किस्म का प्यार करते थे। इतना कि एक दिन वह लड़की पनाह मांगने लगी। गुरुदेव ने 'आह और पनाह' शीर्षक से एक लंबी कविता भी लिखी। कविता मोहल्ले में फेमस हुई। फिर एक दिन लड़की का पिता आया। उसने कहा, आपकी किस्मत भले न अच्छी हो आपकी हिंदी अच्छी है। एक शादी के निमंत्रण पत्र का मैटर बना दीजिए। पूछा गया, किसकी? जवाब में पिता ने अपनी लड़की का नाम बताया।
गुरुदेव के अनुसार उन्होंने दिल पर लोहा, कलेजे पर पत्थर, दिमाग पर रद्दी किताबें रखकर मैटर बनाया। वे अपना लिखा कार्ड लेकर शादी में गये। दबाकर खाना खाया। लिफाफा दिया। घर लौटे। मैंने पूछा था कि वह बेपनाह प्रेम कहां चला गया था। वे मुस्कुराए थे। ऐसा है, प्रेमिका को भूलने के नुस्खों पर एक लंबा लेख लिख रहा हूं। एक नुस्खा बताता हूं। मैंने एकांत में लड़की की फोटो को घृणा से देखा। जा, तू मेरे लायक थी ही नहीं। हह। हुह। हुम्म। कपड़े पर छूटा प्रेम का दाग साबुन से और मन पर छूटा दाग घृणा से दूर होता है। मैंने उसकी कल्पना एक दुश्चरित्र लड़की के रूप में की। ऐसा करने से मन को सुख मिलता है। प्रेमिका को भूलने में मदद मिलती है। जो ख़ुद को हासिल न हो सकें वे लड़कियां चरित्रहीन ही होती हैं। ऐसा अनुभवी समाज का कहना है। तो, ऐसे चरित्रवान गुरु ने मुझे स्वर्णिम लेखन के विविध आयाम समझाए। उनकी सलाह पर चल कर कुछ समय बाद मुझे प्रेमपत्र की विधा में उदीयमान या नवोदित रचनाकार मान लिया गया।
मेरी विनम्रता देखिए कि मैं चुपचाप प्रेमपत्र साधना में लगा रहता था।मुझे लेकर आलोचक प्रेमकार दो गुटों में बंट गये। एक का कहना था कि यह लेखक शोक प्रस्ताव विधा में भी हाथ आज़मा सकता है। बाद में मैंने आज़माए भी। एक जगह तो मैं लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचा। जिस लड़की को मैं पत्र लिखता था वह अपने साहित्यप्रेमी पिता को भी पढ़वा देती थी। आलम यह कि लड़की से अधिक उसके पिता को मेरे प्रेमपत्रों की प्रतीक्षा रहने लगी। उन दिनों मेरी इच्छा होती कि 'मेरे लोकप्रिय प्रेमपत्र' शीर्षक से एक किताब छपा डालूं।
लड़की के पिता कहते कि वैसे तो लड़का लंपट है, मगर भाषा बहुत अच्छी है। वाक्य लच्छेदार बनाता है। विदेशी भाषाओं के उद्धरण भी देता है। बिट्टो से अगले दिन मिलने का समय तय करते हुए विखंडन और भूमंडलीकरण तक जा पहुंचता है और क्या चाहिए। पिता कभी कभार टाइप के भूतपूर्व फ्रीलांसर थे। वे एक फ्रीलांसर प्रेमी का संघर्ष भलीभांति समझते थे। उनका कहना था जब लेखन में कुछ लंपट केवल इस आधार पर सम्मानित हैं कि उनकी भाषा अच्छी है तब प्रेम में ऐसा क्यों नहीं हो सकता।उनकी पूरी सहानुभूति मुझे मिली। बस बिट्टो नहीं मिली। कहना न होगा कि मुझपर क्या बीती। फिर मैंने दूसरी परंपरा की खोज की। अब मेरे प्रेमपत्र दूसरी के पास पहुंचने लगे। मैंने सुख और शोक दोनों को साध लिया।
बहरहाल, यह अभ्यास मेरे बहुत काम आया। दिल्ली में जब एक प्रतिष्ठित पुरस्कार देने वाली संस्था में नौकरी करने गया तो पूछा गया था कि क्या आपको प्रशस्तिपत्र और शोकसंदेश लिखने का अनुभव है। जब मैंने कारण जानना चाहा तो बताया गया कि हम प्राय:उम्रदराज़ लोगों को ही पुरस्कार देते हैं। तय करते के साथ प्रशस्तिपत्र और शोकसंदेश लिखवा कर रख लेते हैं। जाने कब अपूरणीय क्षति हो जाए। प्रशस्ति तो ख़ैर कई बार लेखक ख़ुद लिखकर दे देता है, मगर शोकसंदेश हमें तैयार कराना पड़ता है। शोकसंदेश की गुणवत्ता की जांच के लिए हमने दो सदस्यीय शोकपीठ बना रखी है। यह बात उन्होंने उल्लास के साथ कही।मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं शोकपीठ को ख़ुश रखूंगा। साक्षात्कार लेने वाले एक शख़्स ने कहा कि कल एक शोक संदेश लिखकर दिखाना। मैं सिर हिलाकर शोकाकुल हुआ। मुझे काम मिल गया। अन्य दायित्वों के साथ मुझे 'शोक प्रकाशन प्रभारी' बनाया गया।
यहां भी मेरे गुरु की शिक्षा काम आई। गुरु ने कहा था कि अगर अच्छा शोक संदेश लिखना हो तो अच्छे से मूड बनाना।उदास कॉफ़ी पीना। पुरस्कृत या पुरस्कारातुर कविताएं पढ़ना। शोक के मैनेजमेंट पर विचार करना। ऐसा ही किया। अगले दिन लिखकर ले गया। शोकपीठ के दोनों ने ख़ुशी ज़ाहिर की। मगर चंद हिदायतें दीं। मैंने संदेश शब्द में स पर बिंदी लगाई थी। वे बोले,' स के आगे आधा न लगाओ। हम आदमी का मरना सहन कर सकते हैं, भाषा का मरना नहीं। पर्यायवाची तैयार करो। निधन, नहीं रहे, देहावसान, महाप्रयाण, देहांत के अलावा भी खोजो। मृत लेखक के लेखन में भले वैविध्य न हो, उससे जुड़े शोक में वेराइटी होना चाहिए। ' मैंने उत्साह से कहा कि यह वाक्य कैसा रहेगा--'बड़े आश्चर्य की बात है कि काल ने उनके जीवन की हत्या कर दी। 'वे उछल पड़े। बोले, इस एक वाक्य पर तुम्हें कविता के कई पुरस्कार मिल सकते हैं। मैं पास हुआ।
बहुत वर्षों तक मैं सानंद शोक संदेश लिखता रहा। कोई लेखक मित्र मिलता और पूछता कि आजकल क्या लिख रहे हो। मैं कहता आजकल एक निमंत्रण पत्र या शोकसंदेश पर काम कर रहा हूं। वे ख़ुश होते। कहते मन लगाकर काम करना। सलाह देकर जाते कि नेकी कर शोक संदेश में डाल।
अपने पर घमंड नहीं करता मगर इन दो आयामों के अतिरिक्त होली दिवाली नये साल पर लिखी मेरी काव्याकुल शुभकामनाओं ने भी कामना के नये प्रतिमान बनाए हैं। उम्मीद है मेरे स्वर्णिम लेखन पर पाठकों की नज़र जाएगी। आमीन।

सुशील सिद्धार्थ
08588015394
sushilsiddharth@gmail.com

इस दीपक में तेल नहीं...

भारतीय राजनीति में नारों का इतिहास चुनावों से बहुत पुराना है |पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र, उनकी नीतियाँ सब अपनी जगह पर होते हैं मगर चुनाव में समां बाँधने का काम चुनावी नारे ही करते नज़र आते हैं | किसी भी पार्टी का काम बगैर नारों के नहीं चल सकता | इसके लिए हाईकमान बड़े बड़े लिक्खाडों को हायर करने तक तैयार रहते हैं | यह नारे ही उनकी हार या जीत सुनिश्चित करते हैं | नारे बहुत कुछ कर सकते हैं | इस देश में नारे ही असली माहौल बनाते हैं | नारा महिमा अपरम्पार है | नारे हैं तो हम हैं | सोशल मीडिया के इस क्रांतिकारी युग में आज भी परम्परागत नारों का महत्त्व कम नहीं हुआ है | भारतीय लोकतंत्र में राजनीति की गाड़ी नारों के भीड़तंत्र के पीछे-पीछे चलती है |
ज्यादा पीछे न जाते हुए हम नारों के पिछले सौ साल के इतिहास पर जाएँ तो जब तिलक ने स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कहा तो देशवासियों को अपने अधिकारों का ध्यान आया नहीं तो हम गुलामी के अभ्यस्त हो चुके थे | एक नारे के बल पर अधिकार नाम की चिड़िया से हमारा परिचय कराने के कारण बाल गंगाधर तिलक इतिहास में अमर हो गये | एक मुकम्मल नारा देने से पहले नेतागण पहले किसी स्थान विशेष पर जनता को एकत्र करने के लिए पहले कोई उपनारा देते हैं जैसे स्वतंत्रता संग्राम के वक्त नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने पहले कहा दिल्ली चलो और और लोग दिल्ली की ओर कूच कर दिए | इसके बाद नेताजी ने अपना चिरस्मरणीय नारा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा दिया | इधर नेताजी यह नारा लगाकर हमारे सोये हुए जमीर को जगा रहे थे वहीं दूसरी ओर अपने गांधी बाबा ने करो या मरो के बाद अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसे अविस्मरणीय नारों की रचना कर एक बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया और उन्होंने सत्य और अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को यहाँ से भगाकर ही दम लिया |
देश तो स्वतंत्र हो चुका था | लगा था कि नारों का काम भी ख़त्म हुआ लेकिन नहीं | नारे कभी नहीं मरते | देश की आज़ादी के पहले जितने नारे लगते थे अब उससे दुगुनी मात्रा में नारे लगने लगे | देश की चुनौतियां नारों में तब्दील होकर सामने आईं | लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा लगाया जिसे बाद में अटल जी ने जय जवान जय किसान जय विज्ञान में तब्दील कर अपना नाम दिया | तमाम प्रयासों के बावजूद समस्याओं ने विकराल रूप धारण कर लिया | तीन तीन युद्ध और बीमारी तथा गरीबी से जनता त्राहि-त्राहि कर उठी | ऐसे समय में इंदिरा गांधी का उदय हुआ और उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया | उन्होंने कहा चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें | कांग्रेस की तरफ से जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर जैसे नारे लगाये जाने लगे | जिसका प्रभाव भी चुनाव बाद देखने को मिला | लेकिन यह जनता है सब जानती है खाली नारे ने उसका पेट नहीं भरता | लुभावने वादों और जोशीले नारों से आप कुर्सी तो पा सकते हैं लेकिन लम्बे समय तक जनता का प्यार नही | जनता का इंदिरा से मोहभंग हुआ और आपातकाल के बाद हुए चुनाव में दिनकर की प्रसिद्द कविता की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को ही नारा बना दिया गया | 
इस घटनाक्रम के बाद देश में कई क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हुआ | अब लड़ाई दो तरफ़ा न होकर चौतरफा थी | देश का आकाश नारों से गुंजायमान हो उठा | तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा लेकर बीएसपी सामने आई | बीएसपी का यह नारा सीधा-सीधा जात-पात के सियासी गणित पर आधारित था | इस नारे को फेल होता देख बीएसपी ने फ़ौरन अपना नारा बदल दिया और फिर एक साथ कई सारी आवाजें आई ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर’, ‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर’, ‘ब्राह्मण साफ़, ठाकुर हाफ, बनिया माफ़’, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ | नारों के माध्यम से लोग सियासी वाकयुद्ध करने में मुब्तिला हो गये | नारों का जवाब नारों से दिया जाने लगा | राजा नहीं फ़कीर है, देश की तकदीर है वीपी सिंह के लिए बनाया गया नारा था | जिसका जवाबी नारा – राजा नहीं रंक है देश का कलंक है बना | समाजवादी पार्टी भी नारे देने में पीछे नहीं रही | जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है उसका चुनावी नारा बना | यूपी में है दम क्योंकि यहाँ जुर्म है कम जैसे नारे देकर जनता को आकर्षित करने की कोशिश की गयी |
तत्कालीन इंदिरा सरकार को नीचा दिखाने के लिए नारा गढ़ा गया - खा गयी चीनी पी गयी तेल, ये देखो इंदिरा का खेल | गली-गली में शोर है नारे को तो हर विरोधी दल के नेता ने पकड़ लिया | नारों के द्वारा नेताओं ही नहीं बल्कि दलों को भी नीचा दिखाने की कोशिश भारतीय लोकतंत्र में शान से की गयी | एक ज़माने में जनसंघ ने नारा लगाया था – जली झोपड़ी भागे बैल, ये देखो दीपक का खेल | जवाब में कांग्रेस का नारा भी आया – इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं |
जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू जैसा नारा तो उस समय बच्चे-बच्चे की जुबान पर सुना जा सकता था | बिहार के एक और लाल रामबिलास पासवान के समर्थकों ने नारा बुलंद किया - धरती खोजे आसमान, पासवान-पासवान | कांग्रेस में इंदिरा के बाद राजीव गाँधी आये तो नारा दिया गया तूफ़ान में न आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी में |  जब सारे मुद्दे अन्य पार्टियों ने पकड़ लिए तो बीजेपी ने सत्ता प्राप्ति के लिए राम मंदिर का एक नया मुद्दा उछाल दिया और नारा दिया रामलला हम आयेंगें, मंदिर वहीँ बनायेंगें | एक तरफ उसके लोग अपनी पार्टी की हवा बनाने में लग गये वहीँ दूसरी ओर उसने कांग्रेस राज में हुए घोटालों को भी लेकर जनता के सामने पहुँची और उसने बोफोर्स घोटाले पर सरकार को घेरते हुए सेना खून बहाती है, सरकार कमीशन खाती है का नारा दिया |
नारा बनाना और फिर उसे अवाम तक पहुँचाना कोई हंसी ठट्ठा नहीं | नारे की सफलता इसी में हैं कि उसे बुलंद आवाज़ के साथ लगाया जाया | ख़राब हाजमे वाले नेताओं को नारा लगाने से परहेज करना चाहिए | वैसे भी नारे तो कार्यकर्ता लगाते हैं | नेता तो अपनी रणनीति के हिसाब से नारे सेट करता है और एक बार अपने भाषण के जरिये उस नारे का अपने मुखारविंद से लोकार्पण करता है | बाकी काम उसकी पार्टी का कार्यकर्ता करता है |
एक सफ़ल राजनीतिज्ञ बनने के लिए नारों का उचित ज्ञान अति आवश्यक है | मैं तो कहता हूँ कि सरकार को इसके लिए बाकायदा यूनिवर्सिटी में नारा विज्ञान की पढ़ाई करवानी चाहिए | जगह-जगह नारों के ट्रेनिंग सेंटर्स होने चाहिए जहाँ भावी नेतागण नारों का अभ्यास कर सकें |
अब देखिये न चुनावपूर्व हर हर महादेव से हर हर मोदी निकला और चुनाव बाद मोदी घर-घर पहुँच गये |अब जनता मोदी से उनके चुनावी वादों का जवाब माँग रही है और मोदी जी घर से ज्यादा बाहर बिजी हैं | वह कांग्रेस की जिन योजनाओं को पानी पी-पीकर कोसते थे उनमें उन्हें आज अच्छाईयाँ नज़र आ रही हैं |
जेएनयू फेम कन्हैया कुमार ने ज्यों ही नारा लगाया कि हम लड़ के लेंगें आज़ादी | वह पूरे देश भर में मशहूर हो गये | भला इससे पहले उन्हें कौन जानता था | यह नारे का ही चमत्कार था जिससे देश के सारे मुद्दे ख़तम कर दिए और सबको केवल जेएनयू का मुद्दा ही नज़र आने लगा | कन्हैया – तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है, देश की चिंता किसे है | तुम्हें प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर नारे का शुक्रिया अदा करना चाहिए |आज़ादी के इन नए नारों की शुरूआत के लिए देश आपका कोटि कोटि धन्यवाद ज्ञापित करता है |
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राहुल देव
संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203
मो.– 09454112975
ईमेल-rahuldev.bly@gmail.com

हौसला

आँधियाँ पूछती नहीं रास्ता फ़िज़ाओं से
पंछियों ने कब मांगी परवाज़ हवाओं से।

धधकती कोशिशों को बुझाने की औकात नहीं इनकी
डर न जाना रात को गरजती घटाओं से।

सुलगने दो सीने में सुलगते अंगारों को
कबतक लोगे रोशनी बेनूर सितारों से।

ऐ नाविक तू बीच समन्दर जंग का एलान कर
मांगना मत कोई मदद इन किनारों से।

हर मुश्किल को मात देगा हौसला बनाए रख
हारकर न बैठना इन सख्त सज़ाओं से।

उनको दुआ करने दे तू धार दे कटार को
किसने जीती जंग इनको री दुआओं से।


विनोद कुमार दवे
पाली, राजस्थान
मोबाइल - 9166280718
ईमेल - davevinod14@gmail.com

वतन

तिरंगा लहराता रहे सदा ऊँचे आसमान में
समन्दर भी चरणों में झुका जिसके सम्मान में।

वतन मेरा मेरे दिल में धड़कता रहे धड़कन बन
जीऊँ तो इसकी आन में, मरूँ तो इसकी शान में।

ये महकता चमन है मेरा वतन मेरा भारत
आज़ादी की खुशबु फैली है इस गुलिस्तान में।

बचन पाई कोई सभ्यता काल के प्रहार से
कामयाब रही ये संस्कृति वक़्त के हर इम्तिहान में।

कुदर तभी जिसके गुण गाती है पृथ्वी के कोने कोने
पर्वतों पर, नदी किनारे, खेत में,खलिहान में।

लहू बनकर रहता है मेरे रग रग में मेरा वतन
हवा बनकर बहता है प्रेम भारत महान में।

मौत आए तो आए इसी पावन धरा पर
मिटूँ इसी माटी में, जन्म लूँतो हिन्दुस्तान में।

विनोद कुमार दवे
पाली, राजस्थान
मोबाइल - 9166280718
ईमेल - davevinod14@gmail.com

ले तराश कर तुझे रख दिया

ले तराश कर तुझे रख दिया
अब तू बता कि मैं क्या करूँ ?

तुझे मान लूँ भगवान  या
किसी हादसे की दोआ करूँ ?

ले तराश कर तुझे रख दिया...
यही शर्त है, यही शर्त थी 

जो किसी ने ‘खूब’ बना दिया 
वो जो हाथ कारीगरों के हैं 

उसे काट दो, उसे काट दो I
ले तराश कर तुझे रख दिया...

न ही मेरा तार्रुफ़ अनलहक़
न ही मैंने खुद को भला कहा 

मैं एक प्यादा, गुलाम हूँ 
तुझे जैसे चलना हो चल मुझे I

ले तराश कर तुझे रख दिया...
न ज़ुबाँ मिरी न जिसम मिरा 

न ही रूह का हक़दार मैं 
जो बता मुझे वही बोल दूँ

तिरी नींद है तिरा ख़्वाब है I
ले तराश कर तुझे रख दिया...

मुझे होश है, बेहोश हूँ 
मुझे इसका भी तो पता नहीं 

मुझे लोग कहते रहे हैं क्यों 
मुझे क्या हुआ मुझे क्या हुआ 
ले तराश कर तुझे रख दिया..

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

रात ख़्वाब में तुम आये थे

रात ख़्वाब में तुम आये थे
बैठे थे सिरहाने मेरे
आहिस्ता सहलाते मेरे बालों को
बोसा देते गीत मधुर सा गाते थे
नर्म-सुफ़ैद रौशनी लेकर
चाँद ज़मीं पर आया था,
आँख खुली तो सिरहाना भी सूना था
बेतरतीब पड़े बिखरे थे बाल मेरे
और ज़बीं पे तपिश डालती किरणें थीं
आफ़ताब ने ख़्वाब जला डाला सारा
काश...न आँखें खुलती तो अच्छा होता
रात ख़्वाब में तुम आये थे....

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)